हिंदू धर्म में पितृपक्ष (श्राद्ध पक्ष) का विशेष महत्व है। यह काल 16 दिन का होता है और इसे पितरों की तृप्ति एवं आशीर्वाद प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है। पितृपक्ष के अंतिम दिन श्राद्ध, तर्पण और पितृ-पूजन का विशेष महत्व होता है, क्योंकि माना जाता है कि इस दिन किया गया श्राद्ध समस्त पितरों तक पहुँचता है और वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करता है।
क्यों महत्वपूर्ण है अंतिम दिन? पितृपक्ष का अंतिम दिन जिसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है, उस दिन यदि किसी कारणवश पूर्व दिनों में श्राद्ध नहीं हो पाया हो तो सभी पितरों के लिए सामूहिक श्राद्ध किया जा सकता है।यह दिन उन पितरों को भी समर्पित होता है जिनके निधन की तिथि अज्ञात हो।इस दिन श्राद्ध करने से पितृ दोष शांत होते हैं और परिवार में शांति व समृद्धि आती है।
पितरों को प्रसन्न करने के प्रमुख प्रश्न क्या केवल तर्पण पर्याप्त है या भोजन भी कराना चाहिए?
– शास्त्रों के अनुसार तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराना सभी श्रेष्ठ माने जाते हैं। यदि सब संभव न हो तो कम से कम जल और तिल अर्पित अवश्य करना चाहिए।
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पितृपक्ष का अंतिम दिन न केवल अपने पितरों को स्मरण करने का अवसर है, बल्कि उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने का दिव्य अवसर भी है। श्रद्धा और आस्था के साथ तर्पण, दान और मंत्रजाप करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को स्वास्थ्य, समृद्धि, संतान सुख एवं धर्म मार्ग पर चलने का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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