राधिका का इंतजार :एक कहानी

राधिका हर शाम, सूरज ढलने से ठीक पहले, अपने घर के बरामदे में आ बैठती थी। उसकी नज़रें दूर गाँव के कच्चे रास्ते पर टिकी रहतीं थी जहाँ से गोपाल के लौटने का इंतज़ार रहता था । गोपाल , उसका पति, जो शहर में नौकरी करने गया था। वह कह कर गया था कि वो जल्द लौटेगा। पर “जल्द” की परिभाषा महीने से साल में बदल गई थी, और अब तो तीसरा साल भी पूरा होने वाला था।
गाँव की औरतें उसे समझातीं, “राधिका, क्यों अपना मन दुखाती है? जो चला गया, वो लौट कर नहीं आता ।” कुछ सहानुभूति दिखातीं, “शहर की हवा ही ऐसी है, बड़े-बड़ों को बदल देती है।” पर राधिका के मन में गोपाल की छवि अक्षुण्ण थी, ठीक वैसी ही, जैसी वो छोड़ कर गया था ।
रोज़ शाम, जब गाँव के धूल भरे रास्ते पर कोई हलचल होती, राधिका का दिल धक से कर उठता। क्या ये गोपाल है? कभी कोई साइकिल वाला गुज़रता, कभी कोई किसान अपने पशुओं के साथ लौटता, पर गोपाल नहीं। शाम की लालिमा धीरे-धीरे धुँधली पड़ जाती, और राधिका एक गहरी साँस लेकर, उदास मन से उठ जाती।
उसने गोपाल की याद में घर को सँवार कर रखा था। उसकी लाई हुई छोटी-सी लकड़ी की चौकी आज भी वैसी ही रखी थी, जिस पर वो बैठ कर बातें करते थे। खेतों में भी उसने अपनी जान लगा दी थी, ताकि जब गोपाल लौटे, तो उसे किसी चीज़ की कमी महसूस न हो।
एक दिन, गाँव में एक नया चेहरा आया। एक बूढ़ा आदमी, जो अपने कंधे पर एक गठरी लिए था। राधिका ने उसे देखा, उसकी चाल में थकावट थी, और उसके चेहरे पर समय की गहरी लकीरें। जब वो आदमी राधिका के घर के सामने से गुज़रा, तो उसने एक पल के लिए अपनी गर्दन उठाई। राधिका को लगा, उसकी आँखों में कुछ जाना-पहचाना था।
“कौन हो तुम, बाबा?” राधिका ने पूछा।
बूढ़ा आदमी मुस्कराया, एक फीकी-सी मुस्कान। “मैं… मैं गोपाल का जानता हूँ, बेटी।”
शहर आने के बाद वो मेरे साथ ही रहा करता था ,धीरे धीरे गोपाल रुपया कमाने लगा , तो उसने अलग मकान ले लिया, धीरे धीरे गोपाल और अधिक रूपया कमाने लगा , उसने मुझसे बात करनी बंद कर दी
राधिका का दिल एक पल के लिए रुक गया। “गोपाल… वो कैसा है? कहाँ है वो?” उसकी आवाज़ में बेचैनी थी।
बूढ़ा आदमी ज़मीन पर बैठ गया, गठरी को पास रखते हुए। “गोपाल ने दूसरी शादी कर ली … वो कभी लौट कर नहीं है आएगा।”
राधिका को लगा, ज़मीन उसके पैरों तले से खिसक गई हो। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। “नहीं… नहीं, ये झूठ है!” वो चिल्लाई।
बूढ़ा आदमी शांत रहा।
राधिका ने कहा गोपाल ऐसा कैसे कर सकता है,उसने तो लौट कर आने का वादा किया था वो ऐसा कैसे कर सकते हैं,मेरे होते हुए उसने दूसरी शादी कैसे कर ली।
बुढें आदमी ने कहा यही सच है गोपाल अब शायद ही वापस आएगा!मेरा घर पास के गांव में हैं,मूझे लगा की तुम्हे बता देना चाहिए, क्योंकि गोपाल जब मेरे साथ रहता था तो उसने बताया था कि,वो शादीशुदा है और उसकी पत्नी का नाम राधिका हैं। मैं अपने गांव था रहा था तो तुम्हे बताता चलू। युग कोई भी हो राधिका को गोपाल का वियोग सहना ही पड़ता है!
राधिका इंतज़ार खत्म हो गया था, लेकिन उस इंतज़ार का अंत इतना दर्दनाक होगा, उसने कभी सोचा भी नहीं था।
कई दिनों तक राधिका खामोश रही। उसकी आँखों से आँसू सूख गए थे, और उसके चेहरे पर एक खालीपन छा गया था। लेकिन धीरे-धीरे, उसने खुद को संभाला।
आज भी राधिका हर शाम बरामदे में बैठती है, लेकिन अब उसकी नज़रें गाँव के रास्ते पर नहीं होतीं। वो गोपाल को याद करती है, उसकी बातों को याद करती है, उसके सपनों को याद करती है परंतु उसने इंतज़ार करना छोड़ दिया था, क्योंकि सदियों से राधिका की किस्मत में वियोग लिखा है!

सुनीता कुमारी पूर्णिया बिहार

Editor CP pandey

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