विनोद दुआ: स्वतंत्र पत्रकारिता की बुलंद आवाज, जिसने सत्ता से सवाल पूछने का साहस सिखाया
हिंदी पत्रकारिता जगत में यदि किसी एक नाम को निर्भीकता, निष्पक्षता और बेबाक तेवरों का प्रतीक माना जाए, तो वह है – विनोद दुआ। 11 मार्च 1954 को नई दिल्ली में जन्मे विनोद दुआ ने मीडिया जगत में अपनी अलग पहचान बनाई, जो केवल एक पत्रकार की नहीं, बल्कि एक विचारधारा की थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने के बाद उन्होंने वर्ष 1974 में दूरदर्शन के साथ अपने पत्रकारिता सफर की शुरुआत की, जो आगे चलकर भारतीय समाचार मीडिया के एक मजबूत स्तंभ में बदल गई।
विनोद दुआ ने सिर्फ खबरें नहीं पढ़ीं, बल्कि उन्होंने उन खबरों के पीछे की सच्चाई को उजागर करने का प्रयास किया। प्रमुख चैनलों पर उनकी प्रस्तुति शैली ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दिलाई। सामाजिक अन्याय, लोकतंत्र की मजबूती और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी आवाज हमेशा मुखर रही। उन्होंने सत्ता से सवाल पूछने का साहस किया और आम जन की आवाज को मंच दिया।
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उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 1996 में रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि 2008 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा। इसके अलावा 2017 में मुंबई प्रेस क्लब द्वारा दिए गए रेड इंक अवार्ड ने उनकी पत्रकारिता की विश्वसनीयता और समर्पण को और मजबूती दी।
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कोविड-19 संक्रमण के बाद उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं के चलते 4 दिसंबर 2021 को उनका निधन हो गया। उनका जाना सिर्फ एक पत्रकार का निधन नहीं था, बल्कि निर्भीक पत्रकारिता के एक युग का अंत था। आज भी युवा पत्रकारों के लिए विनोद दुआ एक प्रेरणा हैं, जो यह सिखाते हैं कि कलम तभी शक्तिशाली होती है जब वह सच के साथ खड़ी हो।
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