बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता छोड़ने और देश छोड़कर जाने के करीब डेढ़ साल बाद अब देश में आम चुनाव का समय आ गया है। फरवरी में प्रस्तावित इन चुनावों से पहले सियासी समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। सबसे अहम बदलाव यह है कि शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है, जिससे इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के लिए राजनीतिक जमीन तैयार होती दिख रही है।
अवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद जमात-ए-इस्लामी के अब तक के सबसे बड़े प्रदर्शन की संभावना जताई जा रही है। इसी बीच अमेरिका की भूमिका भी चर्चा में आ गई है। अमेरिका ने बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के साथ अपने संपर्क और संवाद को बढ़ा दिया है, जिसे क्षेत्रीय राजनीति में एक बड़े संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राजनयिकों ने संकेत दिए हैं कि वे जमात-ए-इस्लामी के साथ काम करने को तैयार हैं। यह वही पार्टी है जिस पर बांग्लादेश में कई बार प्रतिबंध लगाया जा चुका है। शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान भी जमात-ए-इस्लामी पर सख्त कार्रवाई की गई थी और पार्टी को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया गया था।
रिपोर्ट में बताया गया है कि 1 दिसंबर को ढाका में महिला पत्रकारों के साथ हुई एक बंद कमरे की बैठक में एक अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि बांग्लादेश अब इस्लामिक दिशा में शिफ्ट हो चुका है। उन्होंने अनुमान जताया कि 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव में जमात-ए-इस्लामी अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। ऑडियो रिकॉर्डिंग के अनुसार अमेरिकी राजनयिक ने कहा, “हम चाहते हैं कि वे हमारे मित्र बनें।” उन्होंने पत्रकारों से यह भी पूछा कि क्या वे जमात की छात्र शाखा के सदस्यों को अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित करने को तैयार होंगी।
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शरिया कानून को लेकर उठ रही चिंताओं पर भी अमेरिकी राजनयिक ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस आशंका को कमतर आंकते हुए कहा कि अगर जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश में शरिया कानून लागू करती है, तो अमेरिका अगले ही दिन उस पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा देगा। इस बयान को राजनीतिक दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शाई ने इस पूरे मामले पर सफाई दी है। उन्होंने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा कि यह बातचीत एक “रूटीन और ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा” थी, जिसमें कई राजनीतिक दलों पर बातचीत हुई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका किसी एक पार्टी का समर्थन नहीं करता और वह उसी सरकार के साथ काम करेगा जिसे बांग्लादेश की जनता लोकतांत्रिक तरीके से चुनेगी।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास बांग्लादेश में काफी विवादित रहा है। इस पार्टी की स्थापना 1941 में इस्लामी विचारक सैयद अबुल आला मौदूदी ने की थी। जमात-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश की पाकिस्तान से आजादी का विरोध किया था। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर पाकिस्तानी सेना का साथ देने और आजादी समर्थक हजारों नागरिकों की हत्या में शामिल होने के आरोप लगे थे।
2009 में सत्ता में लौटने के बाद शेख हसीना ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के तहत जमात के नेताओं पर युद्ध अपराधों के मुकदमे चलवाए। इसके बाद पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे जमात लंबे समय तक राजनीतिक रूप से कमजोर स्थिति में रही।
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हालांकि, 2024 में छात्र आंदोलन के बाद राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया। इसके बाद पार्टी ने खुद को दोबारा संगठित किया और एक प्रभावशाली राजनीतिक ताकत के रूप में उभरने की कोशिश की। शफीकुर रहमान, मिया गोलाम परवर और सैयद अब्दुल्ला मोहम्मद ताहेर के नेतृत्व में पार्टी ने अपना जनाधार मजबूत किया है।
जमात-ए-इस्लामी पारंपरिक रूप से शरिया आधारित शासन और महिलाओं के कामकाजी समय को सीमित करने जैसी नीतियों की वकालत करती रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में पार्टी ने अपनी छवि को नरम दिखाने और भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दों पर जोर देने की कोशिश की है। पार्टी ने हाल ही में नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) के साथ गठबंधन किया है, जो छात्र आंदोलन से उभरी थी, हालांकि इस गठबंधन को लेकर NCP के भीतर भी असहमति देखने को मिली है।
जमात-ए-इस्लामी से अमेरिका के बढ़ते संपर्क को भारत के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। भारत ने 2019 में कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी को गैरकानूनी संगठन घोषित किया था और 2024 में इस प्रतिबंध को आगे बढ़ाया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जमात बांग्लादेश में सत्ता में आती है, तो भारत-बांग्लादेश संबंधों पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
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इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के थॉमस कीन ने अल-जजीरा से बातचीत में कहा कि जमात के सत्ता में आने से भारत-बांग्लादेश रिश्तों को फिर से पटरी पर लाना और भी कठिन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि घरेलू राजनीति के कारण जमात और भारत की बीजेपी सरकार के बीच तालमेल बनना मुश्किल होगा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अमेरिका का जमात-ए-इस्लामी के प्रति झुकाव भारत-अमेरिका संबंधों में भी तनाव बढ़ा सकता है। पहले से ही अमेरिकी टैरिफ, भारत-पाकिस्तान तनाव और रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के रिश्ते दबाव में हैं।
12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव को बांग्लादेश के भविष्य के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। माना जा रहा है कि मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच होगा। जमात ने संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर वह BNP के साथ मिलकर सरकार बनाने को भी तैयार है।
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