आज ज़माना क्या फिर आयेगा,
राधा कृष्ण का त्याग बतलायेगा,
निष्काम प्रेम की आधारशिला,
नि:स्वार्थ आजीवन निभायेगा।
मित्रता की नींव भावनाओं से,
जुड़ी है तो टूटना मुश्किल है,
अगर स्वार्थ से जुड़ी हुई है,
तो टिकना बहुत मुश्किल है।
हर सुबह हर शाम हर किसी
के लिए सुहानी नहीं होती है,
हर दोस्ती हर प्यार के पीछे
कोई कहानी भी नहीं होती है।
परंतु कुछ तो असर होता है,
प्रेमी आत्माओं के मिलन का,
जैसे गोरी गोरी राधिका का,
कृष्ण साँवरे की दीवानगी का।
हर सुबह शाम गुनगुनाया करो,
राधा कृष्ण के गीत गाया करो,
सुबह भी, शाम भी सुहानी होगी,
प्रेम में क़िस्मत आजमानी होगी।
उन जैसा प्रेम कौन कर पायेगा,
राधा बर्साने, कृष्ण द्वारिका रहें
आदित्य अब ये कलियुग है,
सतयुग, त्रेता, द्वापर नहीं है।
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