गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय ने वन विभाग के सहयोग से दो हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में मियावाकी पद्धति पर आधारित घने वन का विकास किया है। इस “मियावाकी वन” का उद्घाटन कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने सिंदूर का पौधा लगाकर किया।
यह वन कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल, राज्यपाल की प्रेरणा से विकसित किया गया है। मियावाकी तकनीक जापानी वन वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित की गई है, जिसमें सीमित स्थान पर देशी प्रजातियों के पौधों का सघन रोपण किया जाता है। इस पद्धति में पौधे तेजी से विकसित होते हैं और कुछ ही वर्षों में प्राकृतिक जंगल जैसा स्वरूप ले लेते हैं।
विश्वविद्यालय परिसर में तैयार इस वन में 50 से अधिक स्थानीय प्रजातियों के लगभग 7000 पौधे लगाए गए हैं। इनमें बेल, सीताफल, कचनार, सिंदूर, पलाश, अमलतास, नीम, आम, जामुन, अर्जुन और इमली जैसे वृक्ष शामिल हैं। इसके साथ ही चमेली, कनेर, गुड़हल, मोगरा जैसे फूलदार पौधों तथा ब्राह्मी, तुलसी, शतावरी, मुलेठी और खस जैसे औषधीय पौधों का भी रोपण किया गया है।
उद्घाटन के अवसर पर कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि विश्वविद्यालय पर्यावरण संरक्षण को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानता है। यह मियावाकी वन न केवल परिसर की हरियाली बढ़ाएगा, बल्कि विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अध्ययन और अनुसंधान की एक जीवंत प्रयोगशाला साबित होगा। साथ ही यह स्थानीय समुदाय को पर्यावरण संवर्द्धन की दिशा में प्रेरित भी करेगा। उन्होंने कहा कि यह वन आने वाली पीढ़ियों के लिए*हरित विरासत सिद्ध होगा और विश्वविद्यालय के सौंदर्य में भी वृद्धि करेगा।
कार्यक्रम में जिला वन अधिकारी विकास यादव ने कहा कि विश्वविद्यालय में विकसित यह परियोजना एक आदर्श उदाहरण है। निकट भविष्य में वन विभाग और विश्वविद्यालय के संयुक्त प्रयास से अन्य हरित परियोजनाओं को भी गति दी जाएगी, जिससे परिसर अधिक हरित और पर्यावरणीय रूप से समृद्ध होगा।
कार्यक्रम का समन्वयन प्रो. अनुभूति दुबे एवं सह-समन्वयक डॉ. अमित उपाध्याय ने किया। अवसर पर प्रो. दिव्या रानी सिंह, डॉ. विनय कुमार सिंह, डॉ. टी. एन. मिश्रा, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. मनीष पाण्डेय, डॉ. आशीष शुक्ला, डॉ. हरिशचंद्र पाण्डेय, डॉ. वंदना सिंह सहित कई शिक्षक एवं अधिकारी उपस्थित रहे।
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