संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। धान खरीद को पारदर्शी बनाने के लिए शुरू की गई नई व्यवस्था फिलहाल किसानों के लिए मुसीबत बन गई है। जिले के अधिकतर खरीद केंद्र तकनीकी खामियों, धीमे सर्वर और बाधित सत्यापन प्रक्रिया से जूझ रहे हैं। नतीजा यह कि खरीद की रफ्तार लगभग थम गई है और किसान हताश होकर वापस लौटने लगे हैं।
सरकार ने इस वर्ष आइरिस स्कैनिंग को अनिवार्य कर दिया है, लेकिन यही प्रक्रिया खरीद में सबसे बड़ी अड़चन बनकर उभर रही है। किसानों की आंखों की पुतलियों की स्कैनिंग बार-बार फेल हो रही है। सर्वर कभी धीमा, कभी पूरी तरह ठप, जिसके चलते एक-एक किसान का सत्यापन करने में कई मिनट लग रहे हैं। स्थिति यह है कि कई केंद्रों पर पूरा दिन बीत जाता है, लेकिन खरीद ढाई-तीन कुंतल से आगे नहीं बढ़ती।
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उम्रदराज किसानों की दिक्कत और गंभीर है। कई किसान मोतियाबिंद और अन्य नेत्र रोगों के कारण स्कैनिंग में सफल नहीं हो पा रहे। परेशान किसान यह कहते हुए लौट रहे हैं कि अगर यही हाल रहा तो वे मजबूरी में आढ़तियों को ही धान बेच देंगे, भले कीमत समर्थन मूल्य के आसपास ही क्यों न मिले।
क्रय एजेंसियों का भी यही कहना है कि लक्ष्य पूरा कर पाना इस स्थिति में लगभग असंभव हो गया है। कई अधिकारियों ने यह आशंका जताई है कि कहीं यह अभियान भी गेहूं खरीद जैसी परिणति न दोहरा दे, जिसमें मंडी के व्यापारी किसानों की उपज उठा ले गए और सरकारी खरीद सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह गई।
जिले में स्थिति यह है कि अधिकतर केंद्रों पर खरीद “नाम मात्र” है। किसानों में बढ़ती बेचैनी और क्रय एजेंसियों की असमर्थता इशारा कर रही है कि यदि समय रहते तकनीकी बाधाएं दूर न की गईं तो धान खरीद पर पूरे सीजन में संकट बना रहेगा।
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