महाराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। कभी राजनीति को जनसेवा का सर्वोच्च माध्यम माना जाता था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में राजनीति त्याग, बलिदान, सिद्धांत और राष्ट्रहित का पर्याय थी। उस समय नेता सत्ता के नहीं, बल्कि सेवा और संघर्ष के प्रतीक होते थे। लेकिन समय के साथ राजनीति का स्वरूप तेजी से बदलता चला गया। आज राजनीति जनसेवा का मंच कम और स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा अधिक बनती जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
विचारधाराओं की जगह वोट बैंक की राजनीति
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारधाराओं का टकराव स्वाभाविक और आवश्यक माना जाता है, क्योंकि इसी से बेहतर नीतियों और योजनाओं का जन्म होता है। दुर्भाग्यवश आज यह टकराव सिद्धांतों और नीतियों से हटकर व्यक्तिगत लाभ, जाति, धर्म और वोट बैंक की गणित पर केंद्रित होता जा रहा है।
चुनाव आते ही लोक-लुभावन वादों की बाढ़ आ जाती है—बड़े-बड़े घोषणा पत्र, मुफ्त योजनाओं के आकर्षक वादे और खोखले दावे। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही अधिकांश वादे फाइलों में दफन हो जाते हैं, जिससे जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।
मूल मुद्दे हाशिये पर
आज की राजनीति का एक बड़ा संकट यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसान और महंगाई जैसे मूलभूत मुद्दे राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची में लगातार पीछे धकेले जा रहे हैं। संसद और विधानसभाएं, जो जनसमस्याओं के समाधान का सबसे बड़ा मंच होनी चाहिए थीं, अक्सर आरोप-प्रत्यारोप, शोर-शराबे और हंगामे का केंद्र बन जाती हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को घेरने में व्यस्त रहते हैं, जबकि आम जनता की समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।
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राजनीति में अपराधीकरण और धनबल का असर
चिंताजनक पहलू यह भी है कि राजनीति में अपराधीकरण और धनबल का बढ़ता प्रभाव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रहा है। चुनाव लड़ने में बढ़ता खर्च, बाहुबल का इस्तेमाल और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की बढ़ती भागीदारी ने ईमानदार, शिक्षित और विचारशील नागरिकों को राजनीति से दूर कर दिया है। परिणामस्वरूप राजनीति में ऐसे चेहरे बढ़ते जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य सेवा नहीं, बल्कि सत्ता के जरिए निजी स्वार्थ साधना है।
जनता का विश्वास और लोकतंत्र
जब राजनीति स्वार्थ का अखाड़ा बन जाती है, तो आम नागरिक का व्यवस्था से विश्वास धीरे-धीरे उठने लगता है। लोकतंत्र केवल कानूनों और संस्थाओं से नहीं चलता, बल्कि जनता के विश्वास से मजबूत होता है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था खोखली हो जाती है। यही कारण है कि आज समाज के हर वर्ग में राजनीति को लेकर निराशा और असंतोष बढ़ता जा रहा है।
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समाधान: सेवा और उत्तरदायित्व की राजनीति
आज सबसे बड़ी आवश्यकता है कि राजनीति को फिर से सेवा, नैतिकता और उत्तरदायित्व के मार्ग पर लौटाया जाए। नेताओं को यह समझना होगा कि सत्ता कोई निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनकल्याण का साधन है। वहीं मतदाताओं की भूमिका भी बेहद अहम है। जनता को जागरूक होकर ऐसे प्रतिनिधियों का चयन करना होगा, जो जाति, धर्म और खोखले वादों से ऊपर उठकर कार्य और ईमानदारी के आधार पर अपनी प्रतिबद्धता साबित करें।
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