Categories: Newsbeat

दशहरे पर पुतलों का दहन, समाज में रावणी प्रवृत्तियों का राज!

व्यंग्य: रावण की ऊँचाई नहीं, रावणी प्रवृत्तियों की करें खिंचाई

Ai निर्मित

लेखक: संजय एम. तराणेकर (कवि, लेखक एवं समीक्षक)

दशहरे का मौसम आते ही रावण की पूछ-परख बढ़ जाती है। साल भर समाज में रावण जैसी प्रवृत्तियाँ फलती-फूलती रहें, किसी को कोई खास परेशानी नहीं होती, लेकिन दशहरा आते ही रावण के पुतले की ऊँचाई पर बहस छिड़ जाती है। कोई 101 फीट का रावण बनाता है, तो कोई 151 फीट का। मानो रावण का कद जितना ऊँचा होगा, बुराई पर विजय उतनी ही शानदार होगी!
समझ में नहीं आता कि रावण को हराने की होड़ लगी है या उसे ऊँचा उठाने की। हर साल पुतले का कद बढ़ता है, आतिशबाजी का खर्च बढ़ता है, भीड़ बढ़ती है, जय श्रीराम के जयकारे गूँजते हैं और अंत में रावण धू-धू करके जल उठता है। लोग तालियाँ बजाते हैं, मोबाइल से वीडियो बनाते हैं और घर लौटकर चैन की नींद सो जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या रावण सचमुच जल गया?
अगर रावण केवल दस सिरों वाला एक पुतला होता, तो मामला बहुत आसान था। एक माचिस की तीली लगाई और बुराई का अंत! मगर आज के रावण के दस सिर नहीं, दसियों चेहरे हैं। कहीं वह भ्रष्टाचार बनकर बैठा है, कहीं रिश्वत की मेज पर मुस्करा रहा है, कहीं गरीब का हक मार रहा है, तो कहीं अपने पद और प्रतिष्ठा का दुरुपयोग कर रहा है। उसके चेहरे पर अच्छाई का मुखौटा है और जेब में स्वार्थ का हिसाब-किताब।
सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आधुनिक रावण को किसी सोने की लंका की जरूरत नहीं। उसे सरकारी दफ्तर की एक कुर्सी, किसी संस्था का ऊँचा पद, सत्ता का संरक्षण या कानून की कमजोर पकड़ भी काफी है। वह दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है और खुद नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ लेता है। पकड़ा जाए तो जांच का इंतजार, आरोप लगे तो साजिश का शोर और सवाल पूछे जाएँ तो चुप्पी की दीवार!
अब प्रश्न उठता है कि ऐसे रावणों का इलाज क्या है? क्या इनके लिए भी 151 फीट का पुतला बनाया जाए? क्या इनके नाम की आतिशबाजी हो? या फिर इनके पुतलों पर भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा जाए—‘बुराई पर अच्छाई की विजय’!
सच तो यह है कि इन रावणों के लिए पुतले जलाने से ज्यादा जरूरी है न्याय का दीप जलाना। कानून ऐसा हो जो गरीब और ताकतवर में अंतर न करे। जांच ऐसी हो जो रसूख के आगे न झुके और सजा ऐसी हो जो अपराधी को उसके अपराध के अनुसार मिले। केवल आरोप लगना अपराध सिद्ध होना नहीं है, लेकिन प्रमाणित अपराधों पर कार्रवाई न होना न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास जरूर कमजोर करता है।
विडंबना देखिए, हम हर साल रावण को जलाने का उत्सव मनाते हैं, लेकिन अपने भीतर बैठे अहंकार, लालच, छल और अन्याय को बचाकर रखते हैं। दूसरों के रावण का दहन हमें अच्छा लगता है, अपने भीतर के रावण से सामना करना नहीं। इसलिए इस दशहरे पर रावण की ऊँचाई नहीं, अपने चरित्र की गहराई नापिए। पुतले की राख से ज्यादा जरूरी है अन्याय की जड़ों को जलाना।
क्योंकि असली विजय उस दिन होगी, जब 151 फीट का रावण जलाने के लिए मैदान में भीड़ जुटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और समाज में बैठे रावण कानून से बचने के बजाय कानून का सम्मान करने लगेंगे। तब शायद दशहरा केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे साल दिखाई देने वाली अच्छाई की पहचान बनेगा।
लेखक परिचय: संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक एवं समीक्षक)
31, संजय नगर, इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)

Editor CP pandey

Recent Posts

71 हजार शिक्षकों ने मांगा मनपसंद स्कूल, 12 जिलों में फंसा काम; कब खुलेगा ट्रांसफर पोर्टल?

बिहार में 6 लाख शिक्षकों के तबादले पर फिर ब्रेक! 7 नवंबर से खुलेगा पोर्टल?…

40 minutes ago

जनगणना 2027 की ड्यूटी का दायरा बढ़ा! निजी शिक्षक, बैंककर्मी और कॉरपोरेट स्टाफ भी हो सकते हैं प्रगणक

जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 18(1) के तहत नियमों में पांचवां संशोधन; केंद्र की अधिसूचना…

60 minutes ago

हर साल जलता हूँ, फिर भी पलता हूँ!

रावण की व्यथा के बहाने आधुनिक समाज के दोहरे चरित्र पर तीखा प्रहार प्रस्तुतकर्ता: संजय…

1 hour ago

कनाडा के सैन्य अड्डे पर काल बनी आग! पलक झपकते सैनिक घिरे लपटों में, 4 की मौत और 39 घायल

Aiनिर्मित सांकेतिक अल्बर्टा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में सैन्य अभ्यास के…

1 hour ago

मेले से लौट रहे लोगों पर कहर बनकर टूटी स्कॉर्पियो! पटना में कई घायल, हादसे के बाद मची चीख-पुकार

पटना में दुर्गा पूजा मेले से लौट रहे लोगों पर मौत बनकर दौड़ी स्कॉर्पियो! 200…

2 hours ago