नवनीत मिश्र “सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, ज़िंदगानी फिर कहाँ… ज़िंदगी गर कुछ रही, तो ये जवानी फिर कहाँ॥”उक्त पंक्तियाँ…