आधार को शामिल न करने पर चिंता खारिज, पहचान दस्तावेजों की संख्या बढ़ाने पर जोर
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया को “मतदाता-अनुकूल” करार देते हुए स्पष्ट किया कि स्वीकार्य पहचान दस्तावेजों की सूची में विस्तार किया जाना चाहिए। अदालत ने आधार कार्ड को सूची से बाहर रखने पर उठाई गई चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाया जाना चाहिए।
पीठ ने सुनवाई के दौरान यह भी विचार किया कि यदि कोई गणना प्रपत्र (Enumeration Form) वैधानिक प्रपत्र (Statutory Form) के सभी बिंदुओं को अपने दायरे में ले लेता है, तो क्या इसे उल्लंघन माना जाएगा या फिर यह अधिक व्यापक अनुपालन की श्रेणी में आएगा।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) पर नागरिकता प्रमाण के मुद्दे पर अपना रुख बदलने का आरोप लगाया। सिंघवी ने दलील दी कि आयोग ने अब यह स्थिति ले ली है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठाने के लिए पहले कोई आपत्तिकर्ता सामने आएगा और कहेगा कि अमुक व्यक्ति नागरिक नहीं है। इसके बाद चुनाव रजिस्ट्रेशन अधिकारी (ERO) नोटिस जारी करेगा और संबंधित व्यक्ति को जवाब देने का अवसर देगा।
सिंघवी ने अदालत से सवाल किया कि इतने सीमित समय में इतनी व्यापक न्यायिक प्रक्रिया कैसे पूरी की जाएगी। उन्होंने कहा, “यदि दिसंबर से SIR प्रक्रिया शुरू की जाए और इसे पूरा करने में एक साल का समय दिया जाए, तो किसी को भी आपत्ति नहीं होगी, लेकिन मात्र दो महीने में यह संभव नहीं है।”
अदालत ने मामले की सुनवाई जारी रखते हुए चुनाव आयोग से कहा कि वह यह सुनिश्चित करे कि मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में अधिकतम पारदर्शिता, सुविधा और दस्तावेज़ लचीलापन उपलब्ध कराया जाए, ताकि कोई पात्र मतदाता वंचित न रह जाए।
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