खेल, संस्कृति और स्वास्थ्य: पारंपरिक खेलों की त्रिवेणी

राष्ट्रीय खेल दिवस मेजर ध्यानचंद जयंती पर विशेष

नवनीत मिश्र

“खेल जीवन का दर्पण हैं।” यह पंक्ति भारत की खेल परंपरा और सांस्कृतिक आत्मा को सटीक रूप से अभिव्यक्त करती है। भारत में खेल कभी केवल शारीरिक व्यायाम भर नहीं रहे, बल्कि वे संस्कृति, अनुशासन, स्वास्थ्य और समाजिक मेल-जोल के वाहक रहे हैं। 29 अगस्त है, वह दिन जब पूरा देश हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को याद करते हुए राष्ट्रीय खेल दिवस मनाता है। ध्यानचंद का नाम आते ही आँखों के सामने वह दौर ताज़ा हो उठता है जब बॉल उनकी स्टिक से ऐसे चिपकी रहती थी मानो जादू हो। 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक स्वर्ण पदक भारत को गौरवशाली पहचान दिलाते हैं। यही कारण है कि खेल दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रेरणा का प्रतीक है। यदि हम थोड़ी देर के लिए इतिहास की गलियों में जाएँ तो पाएँगे कि कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, कुश्ती, पिट्ठू और रस्साकशी जैसे खेल बच्चों और युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करते थे। इन खेलों ने केवल शरीर को तंदरुस्त नहीं बनाया, बल्कि टीम भावना, अनुशासन और रणनीति की समझ भी विकसित की। गाँव के चौपालों से लेकर अखाड़ों तक, इन खेलों ने समाज को एक सूत्र में पिरोए रखा। आज चिकित्सा विज्ञान भी मान चुका है कि खेल मानसिक तनाव को घटाते हैं, हृदय को स्वस्थ रखते हैं और जीवन में उत्साह भरते हैं। यह वही सच्चाई है जिसे हमारे पूर्वजों ने बिना किसी शोधपत्र के अनुभव कर लिया था। उनका मानना था—“जिस घर के बच्चे खेलते हैं, वहाँ रोग टिकते नहीं।” दुर्भाग्य से शहरीकरण और तकनीक ने बच्चों को मैदानों से दूर कर दिया है। मोबाइल गेम्स और टीवी शो ने उनके जीवन से गिल्ली-डंडा और कबड्डी छीन ली है। क्रिकेट और फुटबॉल जैसे अंतरराष्ट्रीय खेलों ने लोकप्रियता तो पाई है, लेकिन हमारी अपनी सांस्कृतिक जड़ें कहीं धुंधली होती जा रही हैं। समय की पुकार है कि पारंपरिक खेलों को नए सिरे से जीवन मिले। स्कूल-कॉलेजों के खेलकूद कार्यक्रमों में इन्हें शामिल किया जाए, ग्राम्य मेलों में ‘खेल महोत्सव’ हों और शहरी पार्कों में इनके लिए जगह सुनिश्चित हो। यदि मेजर ध्यानचंद जैसे खिलाड़ियों को हम अपनी प्रेरणा मानें, तो निश्चय ही नई पीढ़ी मैदान की ओर लौटेगी। खेल दिवस हमें याद दिलाता है कि खेल केवल मेडल या रिकॉर्ड का नाम नहीं है। यह जीवन जीने की कला है—जहाँ शरीर स्वस्थ होता है, मन प्रसन्न होता है और समाज एकजुट होता है। खेल, संस्कृति और स्वास्थ्य—इनकी त्रिवेणी ही भारत की असली ताकत है। आज जब हम मेजर ध्यानचंद को नमन करते हैं, तो साथ ही यह संकल्प भी लें कि मैदानों की रौनक लौटाएँगे और अपने पारंपरिक खेलों को फिर से जीवन देंगे। यही राष्ट्रीय खेल दिवस की सच्ची सार्थकता होगी।

Editor CP pandey

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