शरद पूर्णिमा: उत्साह के साथ मनाया जाता है

28 को शरद पूर्णिमा के साथ चन्द्र ग्रहण का भी योग

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे ‘रास पूर्णिमा’ भी कहते हैं। इसके अन्य नाम ‘कोजागर व्रत’ व ‘कौमुदी व्रत’ भी हैं। इस पूर्णिमा पर चन्द्रमा के साथ-साथ माता लक्ष्मी की भी विशेष पूजा की जाती है। शरद की भीनी- भीनी ठंड में श्रद्धालु अपने परिवारजनों के साथ शरद की पूर्णिमा को उत्साह से मनाते हैं।मान्यता हैं कि इस दिन रात्रि बारह बजे चन्द्रमा से अमृत गिरता हैं और चंद्रमा के इस आशीर्वाद को पाने के लिए खीर अथवा मेवे वाला दूध बनाकर घर की छत पर रखा जाता है, जिसके चारो तरफ परिवारजन बैठकर भजन करते हैं. रात्रि बारह बजे के बाद चन्द्रमा की पूजा की जाती हैं और खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती हैं.यह व्रत सभी मनोकामना को पूर्ण करता हैं. इसे कोजागरी व्रत पूर्णिमा एवम रास पूर्णिमा भी कहा जाता हैं।चन्द्रमा के प्रकाश को कुमुद कहा जाता हैं. इसलिए इसे कौमुदी व्रत की उपाधि भी दी गई हैं।इस दिन भगवान कृष्ण ने गोपियों संग रास लीला रची थी, जिसे महा रास कहा जाता हैं।
हिंदी पंचांग के अनुसार आश्विन की पूर्णिमा को ही शरद पूर्णिमा कहा जाता हैंl इसे उत्तर भारत में अधिक उत्साह से मनाया जाता हैं। कहते हैं इस दिन चन्द्रमा सभी 16 कलाओं में रहता है 2023 में यह व्रत 28 अक्टूबर, को मनाया जायेगा।इस साल शरद पूर्णिमा के दिन यानि 28 अक्टूबर दिन शनिवार को चंद्र ग्रहण हैं। यह इस साल का आखिरी चंद्र ग्रहण हैं। यह चंद्र ग्रहण भारत में भी दिखाई देने वाला है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह चंद्र ग्रहण भारत में 28 अक्टूबर की रात 01:06 बजे से शुरू हो जाएगा जो रात के 02:22 बजे पर तक चलेगा। चंद्रग्रहण शुरू होने के ठीक 9 घंटे पहले सूतक लग जाएगा जो कि 28 अक्टूबर की शाम 04:44 बजे से लगेगा । इस दौरान केवल भगवान का मंत्र जाप करना चाहिए।
शरद पूर्णिमा के विषय में कहा गया है कि
शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ़ रहता है इस दिन आकाश में न तो बादल होते हैं और न ही धूल। इस रात्रि में चंद्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना जाता है। शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है और माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा से कुछ विशेष दिव्य गुण प्रवाहित होते हैं। इस रात चन्द्रमा अमृत वर्षा करता है, जिस कारण इस व्रत का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
रात्रि जागरण के विषय में लोगों की मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात को माता लक्ष्मी स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर आती हैं। इसलिए इस रात्रि में जागरण करना भी शुभ माना जाता है, कहते हैं कि माता किसी को भी जागरण करते हुए देख ले तो उसकी तिजोरी धन सम्पदा से भर देती हैं। इसका एक वैज्ञानिक महत्त्व भी है, चांदनी रात में 10 से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच चांदनी में कम वस्त्रों में घूमने वाले व्यक्ति को ऊर्जा प्राप्त होती है। सोम चक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है और बसंत में निग्रह होता है।

पूजा विधि के विषय में मान्यता है कि इस पूजन को रात्रि के समय जब चन्द्रमा की चांदनी धरती पर बिखरी हो उस समय करना उपयुक्त माना गया है। सबसे पहले चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए। रात्रि के समय जब चाँद निकल आये, तो पानी का अर्घ्य देना चाहिए, उसके बाद धूप, दीप और फल आदि से उनका पूजन करें, तत्पश्चात आरती करें। इस रात को खीर बनाकर खुले आसमान के तले रखा जाता है, क्योकि इस दिन चंद्रमा से एक विशेष प्रकार का रस झरता है, जो अनेक रोगों में संजीवनी की तरह काम करता है।
उसके बाद विधिपूर्वक लक्ष्मी जी की पूजा करें। मां लक्ष्मी की पूजा में सुपारी का विशेष महत्व है। सुपारी को पूजा में रखें। पूजा के बाद सुपारी पर लाल धागा लपेट कर उसका अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि से पूजन करके उसे तिजोरी में रखें, धन से तिजोरी भरी रहेगी ।

क्या कहता है विज्ञान-
शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा हमारी धरती के बहुत करीब होता है। इसलिए चंद्रमा के प्रकाश में मौजूद रासायनिक तत्व सीधे-सीधे धरती पर गिरते हैं। खाने-पीने की चीजें खुले आसमान के नीचे रखने से चंद्रमा की किरणे सीधे उन पर पड़ती है जिससे विशेष पोषक तत्व खाद्य पदार्थों में मिल जाते हैं जो हमारी सेहत के लिए अनुकूल होते हैं।

rkpnews@desk

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