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विकास के वादे और हकीकत: बरहज में बस स्टेशन अब भी सपना

सड़कों पर खड़ी बसें, मगर बस अड्डा नदारद: विकास की दौड़ में पिछड़ता बरहज

पवन पाण्डेय की कलम से


बरहज /देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। कभी उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम को जोड़ने वाला प्रमुख व्यापारिक व धार्मिक केंद्र रहा बरहज आज बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। आधुनिक विकास के दावे तो बहुत किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नगर में आज तक एक व्यवस्थित बस अड्डा नहीं बन सका। नतीजा यह कि बसें सड़कों पर ही खड़ी होती हैं, जिससे आए दिन जाम की स्थिति बनती है और यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बरहज व्यापार का बड़ा केंद्र था। उस समय रेलवे, जल मार्ग और सड़क परिवहन—तीनों माध्यमों से बड़े पैमाने पर व्यापार होता था। सरयू नदी के जरिए जहाजरानी फल-फूल रही थी, रेलवे व्यापारिक आवागमन का मजबूत साधन था और सड़क परिवहन से आसपास के जिलों से सीधा संपर्क बना रहता था। लेकिन समय के साथ हालात बदले। नदी के जलस्तर में कमी के कारण जल मार्ग बंद हो गया, रेलवे सीमित यात्री सेवाओं तक सिमट गई और सड़क परिवहन बिना किसी ठोस योजना के केवल यात्रियों को ढोने का माध्यम बनकर रह गया।

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सड़क पर खड़ी बसें बनती जाम की वजह
बरहज में बस अड्डा न होने का सबसे बड़ा असर यातायात व्यवस्था पर पड़ रहा है। बसें मुख्य सड़कों पर ही खड़ी होती हैं, जिससे बाजार क्षेत्र और प्रमुख चौराहों पर जाम लगना आम हो गया है। खासकर सुबह और शाम के समय स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। यात्रियों को सड़क किनारे खड़े होकर बसों का इंतजार करना पड़ता है—चाहे धूप हो, बारिश हो या कड़ाके की ठंड।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल असुविधा का नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी बड़ा मुद्दा है। सड़क पर खड़े यात्रियों और रुकती-चलती बसों के कारण दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है।

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जनप्रतिनिधियों पर उठ रहा सवाल
बस अड्डे की मांग बरसों से उठती रही है, लेकिन आज तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी। लोगों का आरोप है कि हर चुनाव में विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन नतीजा शून्य रहता है। भाकपा जिला सचिव अरविंद कुशवाहा का कहना है कि बरहज का ऐतिहासिक गौरव धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधि विकास के मुद्दों को छोड़कर जाति-पाति की राजनीति में उलझे रहे, जिससे बुनियादी ढांचा मजबूत नहीं हो सका।
उनका यह भी कहना है कि जब उत्तर-दक्षिण को जोड़ने वाला मोहन सेतु वर्षों बाद भी पूरा नहीं हो सका, तो बस अड्डे की उम्मीद करना जनता के लिए सपना ही बन गया है।


बरहज से रोजगार और व्यापार को मिल सकता है बढ़ावा

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता श्रीप्रकाश पाल का मानना है कि अगर बरहज में बस अड्डे का निर्माण होता है तो इससे न केवल यातायात व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। बस अड्डे से दुकानदारों, छोटे व्यापारियों, ढाबों और ऑटो-टैक्सी चालकों को लाभ मिलेगा। इससे नगर की अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है।
यात्रियों की बढ़ती परेशानियां
बरहज निवासी राजेश निषाद बौद्ध बताते हैं कि बस अड्डा न होने से यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ठंड, गर्मी और बरसात—हर मौसम में यात्रियों को खुले में खड़ा रहना पड़ता है। बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है। बावजूद इसके, कोई भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए आगे नहीं आता।
दूर की यात्रा बनी महंगी और मुश्किल
स्थानीय नागरिक आजाद अंसारी का कहना है कि कई दशक बीत जाने के बाद भी बस स्टेशन का निर्माण न होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। दिल्ली, मुंबई, गुजरात जैसे बड़े शहरों की यात्रा के लिए लोगों को देवरिया या गोरखपुर जाना पड़ता है, जिससे समय और पैसा—दोनों अधिक खर्च होते हैं। यदि बरहज में बस अड्डा होता, तो सीधी बस सेवाएं शुरू हो सकती थीं और यात्रियों पर आर्थिक बोझ कम पड़ता।
कभी व्यापार का हब, आज उपेक्षा का शिकार
प्रदेश सचिव विनोद सिंह ने कहा कि बरहज कभी व्यापार का बड़ा हब था। अंग्रेजों ने यहां रेलवे और जल मार्ग की सुविधा देकर व्यापार को बढ़ावा दिया था। लेकिन आज हालात यह हैं कि रेल सेवा सीमित है और सड़क परिवहन भी अव्यवस्थित। बरहज, पैना, मईल, लार और सलेमपुर जैसे क्षेत्रों के लिए बस सेवाएं बेहद कम हैं। आजमगढ़, बनारस, प्रयागराज और लखनऊ जैसे बड़े शहरों के लिए शाम के बाद यात्रा करना लगभग असंभव हो जाता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अब भी बस अड्डे और सड़क यातायात की अनदेखी की गई, तो जनता का आक्रोश बढ़ सकता है।
सरकार से मांग
स्थानीय लोगों की एकजुट मांग है कि उत्तर प्रदेश सरकार बरहज में शीघ्र बस अड्डे का निर्माण कराए। इससे न केवल यातायात व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि व्यापार, रोजगार और क्षेत्रीय विकास को भी नई दिशा मिलेगी। जनता का कहना है कि अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई की जरूरत है।

Editor CP pandey

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