संसद या हंगामे का अखाड़ा? लोकतंत्र के भविष्य पर गंभीर सवाल

(राष्ट्र की परम्परा के लिए गणेश दत्त द्विवेदी की रिपोर्ट)

लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान उसकी संसद होती है। संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं बल्कि वह पवित्र स्थान है जहाँ जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि राष्ट्रहित में विचार-विमर्श और निर्णय करते हैं। यह वह सर्वोच्च संस्था है जहाँ विभिन्न विचारधाराओं के बीच संवाद और विमर्श के जरिए समाधान निकलता है। लेकिन दुर्भाग्यवश हाल के वर्षों में भारतीय संसद की छवि गंभीर विमर्श के बजाय हंगामे, नारेबाजी और गतिरोध से जुड़ने लगी है। हाल ही में संपन्न मानसून सत्र इसकी ताजा मिसाल रहा, जो शुरुआत से अंत तक राजनीतिक टकराव और शोर-शराबे की भेंट चढ़ गया।

व्यर्थ गया बहुमूल्य समय

लोकसभा के मानसून सत्र के लिए कुल 120 घंटे चर्चा के लिये निर्धारित थे, लेकिन वास्तविक कार्यवाही मात्र 37 घंटे ही चल पाई। यानी 70 प्रतिशत से अधिक समय हंगामे और गतिरोध की भेंट चढ़ गया। राज्यसभा का हाल भी इससे अलग नहीं रहा, जहाँ निर्धारित समय के मुकाबले केवल 41.15 घंटे ही काम हो पाया। यह आंकड़े न केवल निराशाजनक हैं बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने वाले भी हैं।

संसद में बिताया गया हर घंटा जनता के करोड़ों रुपये के टैक्स से संचालित होता है। जब वह समय व्यर्थ चला जाए तो यह सीधे-सीधे जनता के साथ अन्याय है। गुजरात के एक निर्दलीय सांसद ने यह प्रश्न भी उठाया कि यदि सांसद हंगामे के कारण सदन का समय नष्ट करते हैं, तो क्या उन्हें जनता के धन की बर्बादी की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? यह सवाल लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का आईना दिखाता है।

जवाबदेही से बचाव या लोकतांत्रिक परंपरा का अपमान?

लोकसभा में इस बार 419 तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन केवल 55 का ही मौखिक उत्तर मिल सका। इसका अर्थ है कि देश और जनता से जुड़े अनेक अहम सवाल अधूरे रह गए। विपक्ष का कार्य सरकार को जवाबदेह बनाना है और असहमति लोकतंत्र का स्वभाव भी है। मगर असहमति व्यक्त करने का तरीका संवाद और बहस होना चाहिए, न कि हंगामा और नारेबाजी। संसद का चरित्र सड़क जैसे संघर्ष-स्थल का नहीं, बल्कि संवाद के पवित्र मंच का होना चाहिए।

सांसदों की जिम्मेदारी और मतदाताओं की भूमिका

कई सांसद यह तर्क देते हैं कि यदि उनकी आवाज़ संसद में नहीं सुनी जाती तो वे हंगामे को मजबूरी में अपनाते हैं। यह तर्क स्वीकार्य नहीं है क्योंकि सांसदों के पास शून्यकाल, प्रश्नकाल, विशेष उल्लेख और संसदीय समितियों जैसे अनेक मंच उपलब्ध हैं। यदि इनका सदुपयोग हो तो हंगामे की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।

अब समय आ गया है कि जनता भी अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछे। मतदाता केवल जाति, धर्म या दल देखकर वोट न दें, बल्कि यह भी देखें कि उनका सांसद संसद में कितनी बार उपस्थित रहता है, कितने प्रश्न पूछता है और बहसों में कितनी गंभीरता से भाग लेता है। चुनाव आयोग और मीडिया को भी इन आँकड़ों को जनता तक पहुँचाना चाहिए।

लोकतंत्र की मर्यादा बचाने की पुकार

लोकतंत्र का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब संसद की गरिमा और कार्य संस्कृति सुरक्षित रहे। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को समझना होगा कि संसद संघर्ष का अखाड़ा नहीं बल्कि संवाद का मंच है। यदि यह प्रवृत्ति नहीं बदली तो संसद का महत्व जनता की नज़रों में कम होता जाएगा और लोकतंत्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

Editor CP pandey

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