प्रो.राजवंत राव ने ग्रहण किया अधिष्ठाता का कार्यभार
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। विश्वविद्यालय की संरचना में साधारण समझे जाने वाले विद्यार्थी ही शिक्षक को असाधारण बनाते हैं।
उक्त बात प्रो. राजवंत राव ने बुधवार को अधिष्ठाता, कला संकाय का कार्यभार ग्रहण करने के उपरांत कही। उन्होंने कहा कि प्रो. कीर्ति पाण्डेय एक शालीन और कर्मठ आचार्य व अधिष्ठाता रही हैं।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की पूर्व अधिष्ठाता प्रो. कीर्ति पाण्डेय के शिक्षा सेवा चयन आयोग में अध्यक्ष पद पर नियुक्त होने से रिक्त हुए पद पर 02 सितंबर 2024 को प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो.राजवंत राव की नियुक्ति हुई।
प्रो. राव पूर्व में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य रहे हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रतिष्ठित पदों पर अपने दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन कर चुके हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों के अकादमिक निकायों में सदस्य रहे हैं. वर्तमान में वह अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक हैं।
इससे इतर प्रो.राव की पहचान मूलतः इतिहासविद की है। वह पुरातात्विक मसलों में विशेष रूचि रखने वाले प्रो. राव की तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं, जिसमें ‘प्राचीन भारत में धर्म और राजनीति’ पुस्तक ने विशेष ख्याति हासिल की। उन्होंने सम्पादन के क्षेत्र में भी बड़ा काम किया है। उनकी कई सम्पादित पुस्तकों में सशक्त हस्तक्षेप करने वाली ‘भारत का विश्व संस्कृतियों से संवाद’ पुस्तक इसी वर्ष लोकर्पित हुई है. उनके दर्जनों लेख व शोधपत्र विभिन्न जर्नल्स मे प्रकाशित हैं। मौजूदा समय में वह उत्तर प्रदेश सरकार के बड़े प्रोजेक्ट ‘सरयू पार का पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक सर्वेक्षण’ पर अध्ययन कर रहे हैं।
प्रो.राव पुरानी पीढ़ी के आचार्यों में से एक हैं। निजी व अध्यापकीय जीवन में शुचिता का कठोरता से पालन करने वाले प्रो.राव विश्वविद्यालय की चलती आ रही महान परम्परा के मौजूदा अग्रदूत हैं।
प्रो. कीर्ति पाण्डेय की मौजूदगी में प्रो. राव ने कार्यभार ग्रहण किया व दोनों ने एक दूसरे को बधाई व शुभकामनाएं दीं।
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