प्रयागराज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और अपहरण के करीब चार दशक पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने वर्ष 1988 में निचली अदालत की ओर से सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। करीब 38 साल बाद आए इस फैसले ने पुराने आपराधिक मुकदमों में साक्ष्यों और गवाही की विश्वसनीयता को लेकर एक बार फिर ध्यान खींचा है।
मामले में सुभाष नामक व्यक्ति को 26 सितंबर 1988 को सुनाए गए फैसले के तहत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 363, 366 और 376 के अंतर्गत दोषी करार दिया गया था। ये धाराएं क्रमशः अपहरण, महिला को विवाह या अवैध संबंध के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से अपहरण तथा दुष्कर्म से संबंधित थीं। दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए आरोपी ने उच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी।
अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि कथित घटना 25 फरवरी 1986 की है, जबकि प्राथमिकी अगले दिन दर्ज कराई गई थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले थे और चिकित्सकीय परीक्षण में दुष्कर्म की पुष्टि करने वाला कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया था। इन तथ्यों को आधार बनाते हुए दोषसिद्धि पर सवाल उठाए गए।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से अपील का विरोध किया गया। सरकारी अधिवक्ता ने दलील दी कि पीड़िता ने सत्र न्यायालय में सुनवाई के दौरान बयान दिया था और उसकी गवाही विश्वसनीय थी। अभियोजन पक्ष का कहना था कि पीड़िता के बयान के आधार पर दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा जाना चाहिए।
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभियोजन के साक्ष्यों का मूल्यांकन किया। अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को उचित संदेह से परे प्रमाणित नहीं किया जा सका। इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने निचली अदालत का पुराना फैसला रद्द करते हुए सुभाष को बरी कर दिया।
इस फैसले के साथ ही लगभग चार दशक से चले आ रहे इस कानूनी मामले में दोषसिद्धि समाप्त हो गई। अदालत के निर्णय का मुख्य आधार यह रहा कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों को कानूनी मानक के अनुरूप साबित करना आवश्यक है।
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