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लखनऊ और अटल दोनों एक दूसरे के दिल में रहे

  • कर्नल आदि शंकर मिश्र आदित्य

यूँ तो अटल बिहारी वाजपेयी पूरे देश में लोकप्रिय थे, लेकिन, लखनऊ से उनका खास रिश्ता था। लखनऊ न सिर्फ उनकी सियासी कर्मभूमि बना, बल्कि उनके दिल के बेहद करीब रहा। लखनऊवासियों ने उन्हें संसद भेजकर प्रधानमंत्री बनाने का काम किया। अटल विहारी वाजपेयी लखनऊ में जब कभी किसी कार्यक्रम में अतिथि बनाए जाते थे तो उनकी बात यहीं से शुरू होती थी कि मैं लखनऊ का था, हूँ और लखनऊ का ही रहूंगा। इतना कहने के साथ वह मेहमान के बजाय मेजबान के रूप में अपनी भूमिका तय कर लेते थे।

लखनऊ के लोगों का भरोसा जीतने में लगा वक्त:

हालांकि राजनीति के शुरुआती दिनों में लखनऊ के लोगों के साथ अटल जी को नहीं भाया। इसे लेकर वह 1991 में जब लोकसभा चुनाव के यहां से उम्मीदवार हुए तो बोले, ‘आप लोगों ने क्या सोचा था, मुझसे पीछा छूट जाएगा तो यह होने वाला नहीं। ‘मेरो मन अनत कहां सुख पावे’, लखनऊ मेरा घर है। इतनी आसानी से मुझसे रिश्ता नहीं तोड़ सकते। मेरा नाम भी अटल है। देखता हूं कि कब तक मुझे सांसद नहीं बनाओगे! इस चुनाव में अटल सांसद चुन लिए गए।

इसके बाद एक बार अटलजी पर लखनऊवासियों ने जो प्यार बरसाया, अंतिम समय तक वह बरकरार रहा। अटल बिहारी वाजपेयी 1952 में पहली बार लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1962 में भी वह मैदान में उतरे लेकिन उन्हें फिर से हार का सामना करना पड़ा।

उपचुनाव से शुरू हुआ लखनऊ से जीत का सिलसिला:

1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया था। लखनऊ और मथुरा से वह चुनाव हार गये थे, लेकिन बलरामपुर ने उन्हें अपना सांसद चुना था। 1962 में एक बार फिर लखनऊ से अटल जी ने अपना भाग्य आजमाया, लेकिन उन्हें फिर हार मिली। लेकिन वह राज्यसभा के सदस्य चुने गये। 1967 में एक बार फिर वह लखनऊ से लोकसभा का चुनाव लड़े, लेकिन इस बार भी यहां की जनता ने उन्हें नकार दिया। लेकिन बाद में इसी वर्ष हुए उपचुनाव में वह लखनऊ से जीतकर संसद पहुंचे थे।

1971 में अटल जी ग्वालियर से सांसद चुने गये थे, 1977 और 1980 में दिल्ली से जीते। परंतु 1984 में ग्वालियर से चुनाव हार गये थे। 1991 में लखनऊ और विदिशा दोनों सीट से जीते और विदिशा सीट को छोड़ दिया, लखनऊ सीट अपने नाम रखी। इस के बाद लखनऊ से उनका नाता अंतिम समय तक रहा।
हालाँकि 1996 में लखनऊ और गाँधीनगर दोनों जगह से जीते परंतु लखनऊ को अपने पास रखा। 1998, 1999, 2004 में भी लखनऊ से सांसद चुने गये और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बने।हर बार उन्हें लखनऊ में ही लोकसभा में चुन कर भेजा।

इस प्रकार स्व श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी एक बार लखनऊ के हुये तो लखनऊ ने उन्हें अपने सिर माथे पर रखा। यह उन्ही की देन है कि बीजेपी तब से अब तक लोकसभा, विधान सभा और स्थानीय निकाय में वर्चस्व क़ायम रखे हुये है।
श्रद्धेय श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी को उनकी जन्म शताब्दी पर
उनके कर्म क्षेत्र लखनऊ का शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि।

rkpnews@somnath

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