रिश्तों में संतुलन का संकट: भावनाओं के शोषण की सामाजिक सच्चाई
डॉ. प्रियंका सौरभ
मनुष्य का जीवन रिश्तों के ताने-बाने से ही आकार लेता है। परिवार, मित्रता, प्रेम, सहयोग और सामाजिक संबंध—ये सभी हमारे अस्तित्व को अर्थ प्रदान करते हैं। किंतु आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रिश्तों में संवेदनशीलता की जगह स्वार्थ ने ले ली है और भावनाओं को कमजोरी समझा जाने लगा है। जो व्यक्ति दिल से निभाने का प्रयास करता है, वही अक्सर सबसे अधिक आहत और ठगा हुआ दिखाई देता है।
जब कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करता है, सामने वाले की सहूलियतों का ध्यान रखता है, उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करता है और स्वयं को बार-बार पीछे कर लेता है, तो यह त्याग हर बार सम्मान नहीं पाता। कई बार सामने वाला इस व्यवहार को प्रेम या अपनापन नहीं, बल्कि मूर्खता मान लेता है। यहीं से रिश्तों में असंतुलन की प्रक्रिया शुरू होती है।
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कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों की भावनाओं पर टिककर अपने अहंकार को बड़ा करते हैं। वे धीरे-धीरे स्वयं को अत्यधिक महत्वपूर्ण समझने लगते हैं। उन्हें यह भ्रम हो जाता है कि वही रिश्ते का केंद्र हैं, वही निर्णय लेने वाले हैं और सामने वाला व्यक्ति उनके बिना अधूरा है। इसी मानसिकता के चलते वे अनावश्यक उपदेश देने लगते हैं, हर विषय पर अपनी राय को अंतिम सत्य घोषित करते हैं और लगातार बोलते रहने को ज्ञान का प्रमाण मान लेते हैं।
समस्या सलाह देने में नहीं है, समस्या तब पैदा होती है जब सलाह सम्मान के बजाय नियंत्रण का माध्यम बन जाए। जब संवाद बराबरी का न रहकर वर्चस्व स्थापित करने का साधन बन जाए। ऐसे लोग प्रेम, स्नेह, देखभाल और भावनाओं की भाषा नहीं समझते। वे हर रिश्ते को लाभ और हानि के तराजू पर तौलते हैं। उनके लिए रिश्ता एक साधन मात्र होता है, लक्ष्य नहीं।
ऐसे स्वभाव के लोग अक्सर इस भ्रम में जीते हैं कि सामने वाला व्यक्ति उन पर निर्भर है। उसकी विनम्रता, सहनशीलता और समझदारी उन्हें मजबूरी प्रतीत होती है। वे मान लेते हैं कि यह व्यक्ति उन्हें छोड़ नहीं सकता, उनसे प्रश्न नहीं कर सकता और उनका विरोध करने का साहस नहीं रखता। यहीं से भावनात्मक शोषण की प्रक्रिया शुरू होती है, जो धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का रूप ले लेती है।
परंतु हर सहनशीलता की एक सीमा होती है। जब सामने वाला व्यक्ति सजग होता है, आत्मचिंतन करता है और यह समझने लगता है कि उसका अस्तित्व केवल उपयोग की वस्तु बनकर रह गया है, तब वह स्वयं को बचाने का प्रयास करता है। यही क्षण स्वार्थी व्यक्ति को सबसे अधिक असहज करता है, क्योंकि अब उसका नियंत्रण खतरे में पड़ जाता है।
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जैसे ही वह देखता है कि दूसरा व्यक्ति सवाल पूछने लगा है, अपनी बात रखने लगा है या मानसिक दूरी बना रहा है, वैसे ही वह नया तरीका अपनाता है—आरोप लगाने का। अब वही व्यक्ति, जो स्वयं को अत्यंत समझदार और ज्ञानी बताता था, चरित्र पर आक्षेप लगाने लगता है। वह बाहरी लोगों के सामने रिश्ते की कहानी को अपने पक्ष में इस तरह प्रस्तुत करता है कि स्वयं को पीड़ित और सामने वाले को दोषी सिद्ध किया जा सके।
यहीं से रिश्ते का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। संवाद का स्थान आरोप ले लेते हैं। समझ और धैर्य की जगह कटुता और वैमनस्य आ जाता है। हर बातचीत में यह सुनने को मिलता है—“तुम बदल गए हो”, “पहले ऐसे नहीं थे”, “अब तुम घमंडी हो गए हो”। वास्तविकता यह होती है कि यह परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मबोध होता है, जिसे स्वार्थी व्यक्ति स्वीकार नहीं कर पाता।
धीरे-धीरे रिश्ते कुरुक्षेत्र के मैदान में बदल जाते हैं, जहाँ उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि जीत हासिल करना होता है। एक पक्ष चुप रहकर स्वयं को बचाने का प्रयास करता है, जबकि दूसरा पक्ष शोर मचाकर सहानुभूति बटोरने में लगा रहता है। ऐसे लोग सहानुभूति अर्जित करने में अत्यंत कुशल होते हैं। वे अपनी बात को इस प्रकार गढ़ते हैं कि सुनने वाला सहज ही उनके पक्ष में खड़ा हो जाता है।
इन परिस्थितियों में सामान्य, संवेदनशील और नैतिक व्यक्ति सबसे अधिक मानसिक पीड़ा झेलता है। वह जानता है कि हर आरोप का उत्तर देना संभव नहीं है। हर झूठ को सार्वजनिक रूप से काटना उसके स्वभाव और संस्कारों के विरुद्ध है। परिणामस्वरूप वह मौन को अपना हथियार बनाता है, किंतु यही मौन कई बार उसकी कमजोरी समझ लिया जाता है।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि गलती किसकी है? क्या संवेदनशील होना अपराध है? क्या रिश्तों में त्याग करना मूर्खता है? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। गलती संवेदनशीलता में नहीं, बल्कि असंतुलन में है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब रिश्ते एकतरफा हो जाते हैं, जब देने वाला ही देता रह जाता है और पाने वाला केवल लेता रहता है।
इसी कारण रिश्तों की शुरुआत में ही संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। प्रेम, मित्रता या सहयोग—किसी भी संबंध में स्वयं को पूरी तरह खो देना विवेकपूर्ण नहीं है। दूसरे को प्रसन्न रखने के लिए अपनी सीमाओं को बार-बार तोड़ना अंततः आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचाता है।
आत्ममूल्यांकन प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। हमें स्वयं से यह पूछना चाहिए कि क्या यह रिश्ता हमें मानसिक शांति दे रहा है या केवल थकान और पीड़ा? क्या हमारी बातों को सुना जा रहा है या केवल सहन किया जा रहा है? क्या हमारी भावनाओं का सम्मान है या केवल उनका उपयोग किया जा रहा है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं, तो वहाँ रुक जाना ही सबसे बड़ी भूल है। ऐसे में स्वयं को दोषी ठहराने के बजाय ख़ामोशी से दूरी बना लेना अधिक समझदारी भरा निर्णय होता है। दूरी हमेशा द्वेष का प्रतीक नहीं होती, कई बार यह आत्मरक्षा का सबसे सशक्त उपाय होती है।
समाज को भी यह समझने की आवश्यकता है कि हर कहानी के दो पक्ष होते हैं। जो व्यक्ति सबसे अधिक बोलता है, वही हमेशा सत्य बोल रहा हो, यह आवश्यक नहीं। और जो मौन है, वह दोषी हो—यह भी अनिवार्य नहीं। आज का समय कहानी गढ़ने वालों और उसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने वालों का हो गया है, जहाँ सत्य से अधिक उसकी प्रस्तुति महत्त्वपूर्ण हो गई है।
ऐसे दौर में आत्मसम्मान की रक्षा ही सबसे बड़ा धर्म है। यदि रिश्ते बोझ बन जाएँ, यदि उनमें भय, अपराधबोध और हीन भावना भर जाए, तो उन्हें निभाना कोई नैतिकता नहीं है। नैतिकता वहाँ है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे के अस्तित्व और गरिमा को स्वीकार करें।
अंततः यही कहा जा सकता है कि रिश्ते तभी सुंदर और स्थायी होते हैं, जब वे बराबरी और सम्मान पर टिके हों। जहाँ प्रेम हो, वहाँ आदर भी हो। जहाँ अपनापन हो, वहाँ स्वतंत्रता भी हो। और जहाँ यह सब न हो, वहाँ दूरी कोई पराजय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की विजय होती है।
– डॉ. प्रियंका सौरभ
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार
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