नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। इस समय पूरी दुनिया की निगाहें दो बड़ी घटनाओं पर टिकी हैं—पहली, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ और दूसरी, चीन का बढ़ता शक्ति प्रदर्शन। भू-राजनीति के केंद्र में चीन लगातार अपनी जगह मजबूत कर रहा है, जबकि अमेरिका इस तेजी को नजरअंदाज करता दिखाई दे रहा है।
चीन ने हाल के वर्षों में रूस से अपनी साझेदारी और गहरी की है। उत्तर कोरिया जैसे देश भी चीन के करीब आ चुके हैं। ऐसे हालात में अमेरिका के लिए रणनीतिक खतरे कम नहीं बल्कि और बड़े होते दिख रहे हैं।
भारत के लिए भी स्थिति कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता हैं। खासकर तब, जब भारत खुद भी चीन के साथ संबंध सुधारने की कोशिश में जुटा हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाने के बाद नई दिल्ली ने बीजिंग के साथ रिश्तों में गर्माहट लाने की पहल की। दोनों देश अब व्यापारिक साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए कदम उठा रहे हैं।
हालांकि, इस रिश्ते के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा चीन की महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) है। भारत शुरू से ही इस प्रोजेक्ट का विरोध करता रहा है। भारत की असली चिंता बीआरआई के तहत चल रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर है, जो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। यह प्रोजेक्ट भारत की संप्रभुता पर सीधा सवाल खड़ा करता है और यही दोनों देशों के संबंधों में सबसे बड़ी दरार की वजह बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत को अपनी कूटनीतिक रणनीति और भी सतर्कता के साथ तय करनी होगी। एक ओर अमेरिका के साथ व्यापारिक टकराव है तो दूसरी ओर चीन-पाकिस्तान की जोड़ी से सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी सामने हैं। ऐसे में भारत के लिए संतुलन बनाना और अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
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