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हिन्दी के शेक्सपियर ‘रांगेय राघव’: यथार्थ, संघर्ष और सृजन की अमिट विरासत

पुनीत मिश्र

हिन्दी साहित्य में जिन रचनाकारों ने अपने समय की सामाजिक विडम्बनाओं, मानवीय संघर्षों और ऐतिहासिक चेतना को गहन कलात्मकता के साथ स्वर दिया, उनमें डॉ. तिरूमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य ‘रांगेय राघव’ का स्थान विशिष्ट है। उन्हें ‘हिन्दी का शेक्सपियर’ कहा जाना मात्र उपमा नहीं, बल्कि उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की व्यापकता और गहराई का प्रमाण है। जयंती के अवसर पर उनका स्मरण हमें हिन्दी साहित्य की उस परम्परा से जोड़ता है, जहाँ साहित्य केवल सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि समाज की आत्मा की अभिव्यक्ति बन जाता है।
रांगेय राघव का रचनाकर्म असाधारण बहुआयामी है। उपन्यास, कहानी, नाटक, कविता, आलोचना सभी विधाओं में उन्होंने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। उनके उपन्यासों में इतिहास और यथार्थ का जो सजीव संयोजन मिलता है, वह हिन्दी साहित्य को नई दृष्टि देता है। ‘मुर्दों का टीला’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘सीधा सादा रास्ता’ और ‘उपनिवेशवाद’ जैसे उपन्यासों में सामाजिक अन्याय, वर्ग-संघर्ष और मनुष्य की पीड़ा अत्यंत मार्मिक रूप में उभरती है।
उनकी रचनाओं का मूल स्वर यथार्थवाद है, पर यह यथार्थ शुष्क नहीं, बल्कि संवेदनशील और मानवीय है। रांगेय राघव के पात्र किसी काल्पनिक लोक के नहीं, बल्कि हमारे आस-पास के जीवन से उठे हुए जीवंत मनुष्य हैं। वे पीड़ा सहते हैं, संघर्ष करते हैं और प्रश्न पूछते हैं व्यवस्था से, परम्पराओं से और स्वयं से। यही प्रश्नशीलता उन्हें आधुनिक चेतना का प्रतिनिधि बनाती है।
इतिहास के प्रति रांगेय राघव का दृष्टिकोण भी उल्लेखनीय है। वे इतिहास को केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं मानते, बल्कि वर्तमान की समझ का माध्यम बनाते हैं। उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में सत्ता, समाज और संस्कृति की टकराहट स्पष्ट दिखती है। इस दृष्टि से वे साहित्य को सामाजिक विमर्श का सशक्त औज़ार बना देते हैं।
भाषा और शिल्प के स्तर पर भी रांगेय राघव अद्वितीय हैं। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठता और लोक-भाषा का संतुलन दिखाई देता है। संवाद सजीव हैं, वर्णन चित्रात्मक है और कथ्य में तीव्रता है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ पाठक को बाँध लेती हैं और लंबे समय तक मन में बनी रहती हैं।
डॉ. रांगेय राघव का साहित्य हमें यह सिखाता है कि लेखक का दायित्व केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के सच को निर्भीकता से सामने लाना भी है। जयंती के इस अवसर पर उनका स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस साहित्यिक चेतना को पुनः जाग्रत करने का संकल्प है, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने समय में थीं और यही किसी महान साहित्यकार की सच्ची पहचान है।

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