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संस्था निर्माता से जीवन मार्गदर्शक तक-डॉ. विजय गर्ग की यात्रा

भारत में शिक्षा की दुनिया आज आंकड़ों, प्रतिशतों और रैंकिंग की चकाचौंध में उलझती जा रही है। स्कूलों और कॉलेजों की गुणवत्ता का मूल्यांकन अब इस आधार पर किया जाता है कि कितने विद्यार्थियों ने परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया, कितनों को प्रतिष्ठित नौकरियाँ मिलीं और कितनों ने प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफलता हासिल की। लेकिन इस पूरे परिदृश्य के बीच एक बुनियादी प्रश्न अक्सर अनसुना रह जाता है—क्या शिक्षा केवल परिणाम देने का माध्यम है, या यह मनुष्य गढ़ने की प्रक्रिया भी है? इसी प्रश्न का जीवंत उत्तर हैं डॉ. विजय गर्ग, जिनका जीवन और कार्य हमें शिक्षा के वास्तविक अर्थ से परिचित कराते हैं।

डॉ. विजय गर्ग का नाम केवल एक प्रशासनिक अधिकारी या प्रिंसिपल के रूप में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने लगभग चार दशकों तक शैक्षणिक संस्थानों का नेतृत्व किया, लेकिन उनका योगदान किसी पद या दायित्व की सीमाओं में नहीं बंधा। वे उन विरले शिक्षकों में से थे जिनके लिए शिक्षा एक पेशा नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व था। उनके व्यक्तित्व में एक शिक्षक की सरलता, एक चिंतक की गहराई और एक मार्गदर्शक की संवेदनशीलता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक सच्चा शिक्षक केवल जानकारी का स्रोत नहीं होता, बल्कि वह छात्रों के भीतर विचारों की आग जलाने वाला होता है। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य उत्तर देना नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करना है। यही कारण था कि उनके संपर्क में आने वाले विद्यार्थी केवल परीक्षाओं में सफल नहीं होते थे, बल्कि जीवन के जटिल प्रश्नों का सामना करने के लिए भी तैयार होते थे।

डॉ. गर्ग का प्रारंभिक जीवन साधारण परिस्थितियों में बीता, लेकिन उनकी सोच असाधारण थी। ऐसे परिवेश में उनका पालन-पोषण हुआ जहाँ शिक्षा को सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता था। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी लगन और समर्पण के साथ प्राप्त की और अंततः डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। लेकिन इस उपलब्धि को उन्होंने कभी अपने व्यक्तित्व का केंद्र नहीं बनाया। उनके लिए यह केवल एक पड़ाव था, न कि अंतिम लक्ष्य।

उनकी यही विनम्रता और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति उन्हें दूसरों से अलग बनाती है। वे मानते थे कि ज्ञान कभी पूर्ण नहीं होता और एक शिक्षक को जीवन भर विद्यार्थी बने रहना चाहिए। जब उन्होंने प्रिंसिपल का पद संभाला, तब वे इस विचार को अपने साथ लेकर आए कि किसी भी संस्था का प्रमुख सबसे पहले एक समर्पित शिक्षार्थी होना चाहिए। यह सोच उनके पूरे प्रशासनिक कार्यकाल में स्पष्ट रूप से दिखाई देती रही।

वे सुबह सबसे पहले स्कूल पहुँचते और देर तक वहीं रहते। उनके लिए यह केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि एक साधना थी। वे विद्यालय के हर कोने को समझते थे—कक्षाओं की गतिविधियाँ, शिक्षकों की समस्याएँ, और छात्रों की जरूरतें। वे समस्याओं को आदेश देकर नहीं, बल्कि समझकर और सुलझाकर आगे बढ़ते थे। उनकी प्रशासनिक शैली में कठोरता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता थी; दूरी नहीं, बल्कि संवाद था।

उन्होंने शिक्षकों को कभी अधीनस्थ नहीं माना, बल्कि सहयोगी के रूप में देखा। छात्रों को उन्होंने कभी केवल रोल नंबर या परिणाम के रूप में नहीं आँका, बल्कि उन्हें एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। उनके लिए किसी भी संस्था की सफलता का मापदंड परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि वहाँ से निकलने वाले छात्रों का चरित्र और सोच थी।

डॉ. गर्ग के बारे में उनके सहकर्मी और विद्यार्थी अक्सर यह बताते हैं कि वे वर्षों बाद भी अपने छात्रों को नाम से पहचान लेते थे। यह केवल स्मरण शक्ति का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह उस गहरे जुड़ाव का संकेत था जो उन्होंने अपने विद्यार्थियों के साथ बनाया। वे हर छात्र में एक संभावना देखते थे, और उस संभावना को साकार करने के लिए हर संभव प्रयास करते थे।

कई बार वे चुपचाप ऐसे छात्रों की मदद करते थे जो किसी कारणवश पीछे छूट रहे होते थे। कभी एक सलाह देकर, कभी एक अवसर देकर, उन्होंने अनेक जीवनों को दिशा दी। उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि हर उस हाथ को थामना था जो गिरने के कगार पर हो।

समय के साथ जब उनका औपचारिक कार्यकाल समाप्त हुआ, तो उन्होंने सेवानिवृत्ति को विश्राम का माध्यम नहीं बनाया। उनके लिए यह केवल कार्य करने के तरीके का परिवर्तन था। उन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों से स्वयं को अलग किया, लेकिन विचारों और चिंतन की दुनिया से कभी दूरी नहीं बनाई।

आज वे लेखन के माध्यम से शिक्षा और समाज के मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं। उनके लेखों में अनुभव की गहराई और विचारों की स्पष्टता साफ झलकती है। वे शिक्षा नीति, युवाओं की चुनौतियों, और मूल्यों की गिरावट जैसे विषयों पर लिखते हैं, लेकिन उनका दृष्टिकोण हमेशा संतुलित और व्यावहारिक होता है। वे केवल समस्याओं की ओर संकेत नहीं करते, बल्कि उनके समाधान की दिशा भी सुझाते हैं।

उनका लेखन किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक संवाद की तरह प्रतीत होता है। पाठकों को ऐसा लगता है जैसे वे किसी ऐसे व्यक्ति से बात कर रहे हों जिसने जीवन को करीब से देखा है, उसकी जटिलताओं को समझा है और फिर भी आशा को नहीं छोड़ा है।

डॉ. गर्ग का प्रभाव केवल उनके संस्थानों तक सीमित नहीं रहा। उनके विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं—कोई डॉक्टर है, कोई इंजीनियर, कोई शिक्षक, तो कोई प्रशासनिक अधिकारी। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि उनके छात्र सफल हुए, बल्कि यह है कि वे संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बने।

एक शिक्षक की असली विरासत यही होती है कि उसके छात्र उसके मूल्यों को आगे लेकर जाएँ। डॉ. गर्ग ने यही किया। उन्होंने केवल करियर नहीं बनाए, बल्कि चरित्र गढ़े।

उनका निजी जीवन भी उतना ही संतुलित और अनुशासित है जितना उनका पेशेवर जीवन रहा। वे एक नियमित पाठक हैं और इतिहास तथा दर्शन में विशेष रुचि रखते हैं। वे प्रतिदिन टहलते हैं, जो उनके लिए केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक चिंतन का समय होता है।

अपने परिवार के साथ उनका जुड़ाव गहरा है। विशेषकर अपने पोते-पोतियों के साथ उनका व्यवहार यह दर्शाता है कि उनके भीतर का शिक्षक आज भी जीवित है। उनमें वही धैर्य, वही स्नेह और वही जिज्ञासा दिखाई देती है जो उन्होंने अपने छात्रों के साथ साझा की थी।

आज के समय में, जब शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और मूल्यों की जगह प्रतिस्पर्धा ने ले ली है, तब डॉ. विजय गर्ग जैसे व्यक्तित्व हमें यह याद दिलाते हैं कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या है। वे हमें यह सिखाते हैं कि एक शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला नहीं होता, बल्कि वह समाज का निर्माता होता है।

भारत ने अनेक शिक्षाविद और प्रशासक देखे हैं, लेकिन ऐसे शिक्षक बहुत कम हुए हैं जिन्होंने शिक्षा की परिभाषा को ही बदल दिया। डॉ. विजय गर्ग उन्हीं विरले लोगों में से एक हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि सार्थक बनाती है।

और शायद यही कारण है कि उनके द्वारा शुरू की गई वह “शांत क्रांति” आज भी जारी है—हर उस छात्र के माध्यम से, जिसने उनसे कुछ सीखा, और हर उस विचार के माध्यम से, जिसे उन्होंने जगाया।

डॉ. प्रियंका सौरभ
सामाजिक चिंतक एवं स्तंभकार

rkpnews@somnath

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