प्रस्तावना
हनुमान कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि भक्ति, पराक्रम, नीति और धर्म का जीवंत ग्रंथ है। हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा में उनका प्रत्येक चरण मानव जीवन को दिशा देने वाला है। एपिसोड–13 में हम उस महत्वपूर्ण क्षण पर पहुँचते हैं, जहाँ लंका से वापसी, श्रीराम से मिलन और लंका पर चढ़ाई की घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़कर रामायण को निर्णायक मोड़ देती हैं। यह प्रसंग न केवल कथा को आगे बढ़ाता है, बल्कि पाठक के मन में साहस और विश्वास की नई ऊर्जा भर देता है।
लंका से वापसी: कर्तव्य पूर्ण होने का गर्व नहीं, विनम्रता का भाव
सीता माता से भेंट, उनका संदेश और लंका दहन—इन तीनों के बाद हनुमान जी का उद्देश्य पूर्ण हो चुका था। हनुमान कथा में यह प्रसंग विशेष इसलिए है क्योंकि अपार शक्ति और सफलता के बाद भी हनुमान जी के मन में अहंकार नहीं आता। वे जानते थे कि यह सब श्रीराम की कृपा से संभव हुआ है।
समुद्र लाँघते समय वे पुनः अपने भीतर वही संयम रखते हैं। यह हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा का मूल संदेश है—सफलता के बाद भी विनम्र रहना।
समुद्र पार करते समय देवताओं की स्तुति
जब हनुमान जी लंका से लौटते हैं, तब देवता उनके पराक्रम की प्रशंसा करते हैं। वायु देव, अग्नि देव और वरुण देव सभी उनके साहस से प्रसन्न होते हैं। लंका से वापसी का यह क्षण दर्शाता है कि धर्म के मार्ग पर चलने वाला अकेला नहीं होता, ईश्वर की शक्तियाँ स्वयं साथ देती हैं।
श्रीराम से मिलन: भक्ति और विश्वास का सर्वोच्च क्षण
हनुमान जी का श्रीराम से मिलन रामायण के सबसे भावुक प्रसंगों में से एक है। जैसे ही हनुमान जी सीता माता का समाचार सुनाते हैं, श्रीराम की आँखों में करुणा और आशा एक साथ छलक उठती है।
हनुमान जी द्वारा दी गई चूड़ामणि देखकर श्रीराम का हृदय भर आता है। यह हनुमान कथा का वह पल है जहाँ भक्ति और विश्वास का मिलन होता है। श्रीराम कहते हैं—
“हनुमान, तुमने जो कार्य किया है, उसे मैं कभी नहीं भूल सकता।”
यह वाक्य दर्शाता है कि सच्ची सेवा कभी निष्फल नहीं जाती।
वानर सेना में उत्साह और रणनीति का निर्माण
हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा में यह चरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। सीता माता के जीवित होने का समाचार सुनकर वानर सेना में नया जोश भर जाता है। सुग्रीव, अंगद, जामवंत सभी श्रीराम के साथ युद्ध की रणनीति बनाते हैं।
लंका पर चढ़ाई से पूर्व यह रणनीतिक तैयारी बताती है कि केवल शक्ति नहीं, बल्कि बुद्धि और संगठन भी विजय के लिए आवश्यक हैं।
लंका पर चढ़ाई: धर्म बनाम अधर्म का महासंघर्ष
जब वानर सेना लंका की ओर बढ़ती है, तब यह केवल एक नगर पर आक्रमण नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की चढ़ाई है। लंका पर चढ़ाई का प्रसंग बताता है कि अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य की विजय होती है।
हनुमान जी यहाँ भी अग्रिम पंक्ति में रहते हैं। उनकी उपस्थिति मात्र से वानर सेना का मनोबल कई गुना बढ़ जाता है। यह हनुमान कथा का वह चरण है जहाँ पराक्रम अपने चरम पर पहुँचता है।
रावण का भय और लंका का कंपन
लंका में जैसे ही वानर सेना की आहट पहुँचती है, रावण के मन में भय उत्पन्न होता है। उसने हनुमान जी के पराक्रम को पहले ही देख लिया था। हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा में यह संकेत मिलता है कि अधर्मी का हृदय पहले ही हार मान लेता है, भले ही बाहरी रूप से वह शक्तिशाली दिखे।
हनुमान जी का संदेश: शक्ति नहीं, भक्ति सर्वोपरि
लंका पर चढ़ाई के दौरान हनुमान जी बार-बार यही स्मरण कराते हैं कि यह युद्ध श्रीराम के लिए है, व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए नहीं। हनुमान कथा का यह संदेश आज के समाज में भी उतना ही प्रासंगिक है—जब उद्देश्य पवित्र हो, तब विजय निश्चित होती है।
शास्त्रोक्त दृष्टि से कथा का महत्व
वाल्मीकि रामायण और अन्य शास्त्रों में वर्णित यह प्रसंग बताता है कि हनुमान जी केवल बलवान नहीं, बल्कि महाज्ञानी और नीति के ज्ञाता भी हैं। हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा में उनका चरित्र आदर्श सेवक, सच्चे मित्र और निर्भीक योद्धा के रूप में उभरता है।
आधुनिक जीवन में हनुमान कथा की प्रासंगिकता
आज के समय में लंका से वापसी, श्रीराम से मिलन और लंका पर चढ़ाई हमें सिखाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए।
हनुमान कथा हमें बताती है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और ईश्वर पर विश्वास अटूट हो, तो असंभव भी संभव बन जाता है।
निष्कर्ष
एपिसोड–13 की यह हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा भक्ति, साहस और नीति का अद्भुत संगम है। लंका से वापसी विनम्रता सिखाती है, श्रीराम से मिलन विश्वास को मजबूत करता है और लंका पर चढ़ाई हमें धर्म के लिए संघर्ष करना सिखाती है।
यह कथा केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए है।
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