भारतीय राजनीति और चिंतन के इतिहास में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का स्थान केवल एक विचारक या संगठनकर्ता का नहीं, बल्कि एक ऐसे द्रष्टा का है, जिसने भारत को उसकी आत्मा से जोड़कर देखने का साहस किया। उनकी पुण्यतिथि हमें स्मरण कराती है कि राजनीति केवल सत्ता का साधन नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान का माध्यम होनी चाहिए।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद पश्चिमी भौतिकवाद और साम्यवादी वर्ग-संघर्ष दोनों से भिन्न एक समग्र भारतीय दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह दर्शन मानव को केवल आर्थिक इकाई नहीं मानता, बल्कि उसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा, चारों स्तरों पर विकसित होने वाला पूर्ण व्यक्तित्व मानता है। उनके अनुसार समाज, राष्ट्र और व्यक्ति एक-दूसरे से पृथक नहीं, बल्कि एक जीवंत इकाई के अंग हैं।
इसी दर्शन से जन्म लेता है अंत्योदय का विचार अर्थात समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का उत्थान। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मूल्यांकन उसकी गगनचुंबी इमारतों या आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि सबसे कमजोर नागरिक का जीवन कितना सम्मानपूर्ण हुआ है।
उनका जीवन स्वयं उनके विचारों का प्रतिबिंब था। सादा जीवन, उच्च विचार। निजी सुख, सुविधा और पद की आकांक्षा से दूर रहकर उन्होंने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। संगठन निर्माण, वैचारिक स्पष्टता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उन्होंने जन-जन तक पहुँचाया।
आज जब विकास की परिभाषा अक्सर केवल उपभोग और लाभ तक सीमित हो जाती है, तब उनका चिंतन चेतावनी देता है कि यदि विकास मानवता से कट गया, तो वह विनाश का कारण बन सकता है। आत्मनिर्भरता, स्वदेशी सोच, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक समरसता उनके विचारों के केंद्र में रहे।
उनकी पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, क्या हमारी राजनीति और नीतियाँ वास्तव में अंत्योदय की दिशा में अग्रसर हैं?
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का विचारकालातीत है। वह वर्तमान की आवश्यकता और भविष्य का मार्गदर्शक है। सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके विचार व्यवहार और नीति का हिस्सा बनें।
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