उतरौला/बलरामपुर (राष्ट्र की परम्परा) उतरौला विकास खंड की 65 ग्राम पंचायतों में से 30 पंचायतों में महिलाओं को ग्राम प्रधान की कमान है,लेकिन ग्राम प्रधान की जगह उनके स्वजन या प्रधानी जिताने वाले ही पंचायत चला रहे हैं।इन सब पंचायतों में महिला ग्राम प्रधान के पद पर काबिज होने के बाद भी अधिकांश पंचायतों में सत्ता की चाबी उनके हाथों में नही रहकर उनके प्रतिनिधियों के हाथों में है ऐसे में गांव के कामकाज ठीक तरीके से नहीं हो पा रहे हैं।
आपको बता दें कि 30 ग्राम पंचायतों में महिला ग्राम प्रधान चुनी गई हैं लेकिन महिलाओं की शक्ति महज उनके नाम तक ही सीमित है।आरक्षण की मजबूरी ने महिलाओं को ग्राम प्रधान तो बना दिया है, लेकिन असली प्रधान तो उनके प्रतिनिधि हैं।अधिकांश ग्राम पंचायतों में तो महिला ग्राम प्रधान को हस्ताक्षर करने तक का मौका नहीं दिया जाता,65ग्राम प्रधानों में 30 गांव की मुखिया महिलाएं हैं जिन गांवों की प्रधान महिलाएं हैं वहां ग्राम प्रधान का पूरा काम उनके पति,पुत्र,देवर ,ससुर या प्रतिनिधि देखते हैं।चुनाव जीतने के बाद इनकी मुहर ,डोंगल व पंचायतों से जुड़े अभिलेख भी प्रतिनिधि ही संभालते हैं।अधिकांश गांवो में प्रधान के बजाय लोग उनको ही प्रधान कहते और समझते हैं।महिला ग्राम प्रधानों के अलावा अनुसूचित जाति व पिछड़ी जाति के अधिकतर प्रधानों को अपने प्रतिनिधि के पीछे चलना पड़ता है।कई गांवों में तो अपनी प्रतिष्ठा लगाकर अपने खास को प्रधान बनाने वाले मांगने पर भी उन्हें मुहर डोंगल व पंचायत से जुड़े महत्वपूर्ण अभिलेख नही देते।ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि इस कदर हावी रहते हैं कि वे उन बैठकों को भी अटैंड करते हैं जहां प्रत्येक दशा में जन प्रतिनिधि का होना आवश्यक होता है।मीटिंग के एजेंडे पर भी प्रतिनिधि ही प्रधान के हस्ताक्षर कर देते हैं।
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