कैलाश सिंह
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। समाज में तेजी से फैलता नशे का कारोबार आज समाज की सबसे बड़ी चुनौतियों में शुमार हो चुका है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस अवैध कारोबार का सबसे आसान और बड़ा शिकार युवा पीढ़ी बनती जा रही है। ड्रग्स, स्मैक, गांजा, चरस, नशीली गोलियां और शराब—ये सब अब केवल सीमित दायरे तक नहीं रहे, बल्कि गांव-गांव, कस्बे-कस्बे और शहर की गलियों तक अपनी पैठ बना चुके हैं।आज 15 से 25 वर्ष की उम्र के युवा तेजी से नशे की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पढ़ाई का दबाव, बेरोजगारी, मोबाइल और सोशल मीडिया का गलत प्रभाव, संगत की चूक और आसान पैसा—ये सभी कारण युवाओं को नशे की दलदल में धकेल रहे हैं। शुरुआत शौक या तनाव से राहत के नाम पर होती है, लेकिन जल्द ही यही शौक जानलेवा लत में बदल जाता है।
सूत्रों की मानें तो नशे के सौदागर बेहद संगठित तरीके से काम कर रहे हैं। छोटे-छोटे स्कूल, कॉलेज, ढाबों और बस अड्डों के आस-पास सक्रिय हैं। मोबाइल कॉल और मैसेजिंग ऐप्स के जरिए डील तय होती है और पुलिस की आंखों से बचते हुए माल युवाओं तक पहुंचा दिया जाता है। कहीं-कहीं कार्रवाई जरूर होती है, लेकिन वह ऊंट के मुंह में जीरे समान साबित हो रही है।
परिवारों में पसरा मातम
नशे की लत केवल एक व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को बर्बादी की ओर ले जाती है। घरों में कलह, आर्थिक तंगी, चोरी-चकारी और हिंसा बढ़ रही है। कई माता-पिता तब जागते हैं, जब बहुत देर हो चुकी होती है। इलाज के नाम पर लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं, फिर भी सफलता की कोई गारंटी नही।युवा किसी भी देश की रीढ़ होते हैं। जब वही नशे की गिरफ्त में आ जाएं, तो राष्ट्र का भविष्य कमजोर होना तय है। नशे की वजह से अपराध बढ़ रहे हैं, सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं और मानसिक बीमारियों में इजाफा हो रहा है। यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक संकट भी है।
जरूरत सामूहिक लड़ाई की। नशे के कारोबार पर लगाम लगाने के लिए सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई पर्याप्त नहीं है।प्रशासन को सख्त और निरंतर अभियान चलाने होंगे।
शिक्षण संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रम अनिवार्य किए जाने चाहिए। परिवारों को बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखनी होगी।समाज और जनप्रतिनिधियों को खुलकर आगे आना होगा।
जब तक नशे के खिलाफ सामूहिक और ईमानदार लड़ाई नहीं लड़ी जाएगी, तब तक युवा पीढ़ी यूं ही शिकार बनती रहेगी और नशे का कारोबार फलता फूलता रहेगा। सवाल यही है—क्या हम भविष्य को बचाने के लिए अभी कदम उठाएंगे, या फिर केवल पछतावे के लिए तैयार रहेंगे?
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