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श्रीमद् भागवत के तीसरे दिवस व्यास जी से सुखदेव जी का उपदेश कथा का वर्णन

धीरेन्द शर्मा
कथा सुन आनंद विभोर हुये श्रद्धालु

भागवत से होता है मानव को कर्तव्यबोध: आचार्य पंडित बेचू दयाल

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, कर्म के फलों में कभी नहीं है इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो।

बहराइच (राष्ट्र की परम्परा) । ब्लॉक नवाबगंज के ग्राम सभा चौगोंई विलासपुर के ग्राम विलासपुर में राम जानकी शर्मा एवं आचार्य अजय कुमार शास्त्री के आवास पर हो रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के तीसरे दिन कथा वाचक विद्या वारिधि आचार्य पंडित बेचू दयाल पाठक ने श्रद्धालुओं को श्रीमद् भागवत महापुराण कथा का रस पान करते हुये कहा कि जीवन में सत्संग व शास्त्रों में बताये गये आदर्शों का श्रवण करना जैसे कहने वाले से सुनने वाले को ज्यादा ध्यान देना चाहिए तभी भगवान के आनंद विभोर भक्ति आत्मा में जाग्रति होती है। आचार्य ने भगवत कथा को आनंदमय से विस्तार करते हुये कहा कि सत्संग में वह शक्ति है, जो व्यक्ति के जीवन को बदल देती है।
आचार्य ने कहा कि सभी मनुष्यों को अपने जीवन में क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, संग्रह आदि का त्यागकर विवेक के साथ श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए। भागवत कथा के दौरान आचार्य ने कपिल चरित्र, सती चरित्र, धु्रव चरित्र, जड़ भरत चरित्र, नृसिंह अवतार आदि प्रसंगों पर प्रवचन करते हुए कहा कि भगवान के नाम मात्र से ही व्यक्ति भवसागर से पार उतर जाता है।
श्रीमद् भागवत के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुये कहा की जितने प्यार से भोजन करते हो उतने ही प्यार से भगवान का भजन करना चाहिए और भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं है, भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए क्यों कि बचपन कच्चे मिट्टी की तरह होता है। उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है। कथा के दौरान उन्होंने बताया की पाप के बाद कोई व्यक्ति नरक गामी हो, इसके लिए श्रीमद् भागवत में श्रेष्ठ उपाय प्रायश्चित्त बताया गया है। कथा का वर्णन करते हुये कहा कि जब तक जीव माता के गर्भ में रहता है तब तक वह बाहर निकलने के लिये छटपटाता रहता है।
उस समय वह जीव बाहर निकलने के लिये ईश्वर से अनेक प्रकार के वादे करता है, मगर जन्म लेने के पश्चात सांसारिक मोह माया में फंस कर वह भगवान से किए गये वादों को भूल जाता है। जिसके परिणामस्वरूप उसे चौरासी लाख योनी भोगनी पड़ती है, व्यक्ति अपने जीवन में जिस प्रकार के कर्म करता है उसी के अनुरूप उसे मृत्यु मिलती है। कथा वाचक आचार्य ने कहा की प्रभु जब अवतार लेते हैं तो माया के साथ आते हैं। साधारण मनुष्य माया को शाश्वत मान लेता है और अपने शरीर को प्रधान मान लेता है,जबकि शरीर नश्वर है। वहीं कथा में सहयोग दें रहे आचार्य देवकीनंदन पाठक कहा की भागवत बताता है कि कर्म ऐसा करो जो निष्काम हो वहीं सच्ची भक्ति है। कथा में राघवराम शर्मा , मुरारी नाथ शर्मा,राम बाहोरी पाठक, रुपेश पाठक,राजु पाठक, रोहित शर्मा,सजन कुमार ,गुरु दिन यादव, किशोरी लाल यादव, मनसा राम, सहित उपस्थित रहे।

Editor CP pandey

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