कटान, बजट और लापरवाही: क्यों नहीं बन सका मोहन सेतु?

11 साल बाद भी अधूरा मोहन सेतु: बरहज के विकास पर भारी राजनीति, जनता आज भी इंतज़ार में

पवन पाण्डेय की कलम से


बरहज, देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। सरयू नदी पर प्रस्तावित मोहन सेतु आज सिर्फ एक अधूरा पुल नहीं, बल्कि बरहज क्षेत्र की टूटी उम्मीदों और ठहरे विकास का प्रतीक बन चुका है। देश के सर्वश्रेष्ठ सांसदों में शुमार रहे, चारों सदनों के सदस्य और प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक स्वर्गीय मोहन सिंह के नाम पर बनने वाला यह सेतु, 11 वर्ष बीत जाने के बाद भी आम जनता के लिए नहीं खुल सका है।
22 सितंबर 2013 को मोहन सिंह के निधन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने बरहज पहुंचकर सरयू नदी पर मोहन सेतु निर्माण की घोषणा की थी। इसके बाद लखनऊ में तत्कालीन पीडब्ल्यूडी मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने प्रतीकात्मक शिलान्यास किया। 28 फरवरी 2014 को मोहन सिंह की पुत्री और तत्कालीन राज्यसभा सांसद कनकलता सिंह ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विधिवत भूमिपूजन भी किया, लेकिन इसके बाद निर्माण की रफ्तार ऐसी थमी कि आज तक पुल अधूरा है।
कटान, लागत और राजनीति में उलझा मोहन सेतु
शुरुआती योजना में 39 पायों (पिलर्स) का आगणन तैयार किया गया था। लेकिन बीते वर्षों में सरयू नदी की भीषण कटान ने पुल के दक्षिणी छोर को करीब 70 मीटर से अधिक नुकसान पहुंचाया। हालात को देखते हुए पीडब्ल्यूडी अभियंताओं ने कम से कम 9 अतिरिक्त पायों की आवश्यकता जताई।
क्षेत्रीय विधायक दीपक मिश्र शाका और पूर्व सांसद कनकलता सिंह के प्रयासों के बाद आईआईटी और पीडब्ल्यूडी की संयुक्त टीम ने स्थल निरीक्षण कर अतिरिक्त पायों की जरूरत को तकनीकी रूप से सही ठहराया। इसके बावजूद, बजट और प्रशासनिक स्वीकृति अब तक अधर में लटकी हुई है।
स्थानीय लोगों में यह चर्चा भी दबी ज़ुबान से है कि समाजवादी विचारधारा से जुड़े मोहन सिंह के नाम पर सेतु होने के कारण कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ रही है। हालांकि, जनप्रतिनिधि इसे महज़ तकनीकी और वित्तीय अड़चन बताते हैं।
जनता की पीड़ा: नाव से जान जोखिम में
बरहज की उत्तर और दक्षिणी आबादी के लिए मोहन सेतु जीवनरेखा साबित हो सकता है। बाढ़ के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं। लोगों को छोटी-बड़ी नावों से सरयू पार करनी पड़ती है, जहां हर सफर जान जोखिम में डालने जैसा होता है। व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित होती हैं।
जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों की आवाज
पूर्व राज्यसभा सांसद कनकलता सिंह का कहना है कि मोहन सेतु बरहज के विकास का पथ प्रदर्शक हो सकता था, लेकिन कई जनप्रतिनिधियों ने जनता की आंखों में धूल झोंकने का काम किया। 11 वर्षों से पुल धूल फांक रहा है और लागत अप्रत्याशित रूप से बढ़ चुकी है।
बीआरडी बीडी कॉलेज बरहज के पूर्व प्राचार्य डॉ. अजय कुमार मिश्र कहते हैं कि मोहन सेतु अगर समय से पूरा हो जाता, तो बरहज विकास की दौड़ में बहुत आगे होता। जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा ही इसकी सबसे बड़ी वजह है।
पूर्व चेयरमैन अजीत जायसवाल का कहना है कि बरहज के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ किया गया है। मोहन सेतु इसका जीता-जागता सबूत है।
वहीं, सपा नेता विजय रावत ने आरोप लगाया कि सरकार विकास का प्रचार तो कर रही है, लेकिन मोहन सेतु जैसी बुनियादी परियोजना एक दशक से बाढ़ और उपेक्षा झेल रही है।
2027 से पहले उम्मीद या फिर निराशा?
अब सबकी निगाहें 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सरकार के फैसले पर टिकी हैं। अगर नौ अतिरिक्त पायों के लिए धन आवंटन और तेज़ी से काम शुरू होता है, तो मोहन सेतु बरहज के विकास को नई दिशा दे सकता है। वरना, यह पुल आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक अधूरी कहानी बनकर रह जाएगा।
बरहज के लोगों की मांग साफ है—राजनीतिक मतभेद भुलाकर सभी जनप्रतिनिधि एकजुट हों और मोहन सेतु निर्माण को प्राथमिकता दें, ताकि सरयू के दोनों किनारों को जोड़ने वाला यह सेतु वास्तव में विकास का सेतु बन सके।

Editor CP pandey

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