🔴 इतिहास के प्रतिशोध के बहाने इतिहास से ही प्रतिशोध
✍️ बादल सरोज
तर्क, विवेक और वैज्ञानिक चेतना पर आधारित भविष्य की ओर बढ़ते किसी भी संवैधानिक लोकतांत्रिक गणराज्य में, बीते सप्ताह सामने आए दृश्य गहरी चिंता पैदा करते हैं। सत्ता और विधायिका के सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों का धार्मिक वेश में सार्वजनिक मंचों से उन्मादी संकेत देना और इतिहास के नाम पर प्रतिशोध का आह्वान करना, केवल प्रतीकात्मक आचरण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना पर सीधा प्रहार है।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल द्वारा “इतिहास का प्रतिशोध लेने” का सार्वजनिक आह्वान और उसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री द्वारा सोमनाथ मंदिर के मंच से दिए गए भाषण, एक ही वैचारिक लय में गढ़े गए प्रतीत होते हैं। यह कोई आकस्मिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि सुनियोजित वैचारिक आक्रमण है, जिसमें इतिहास को तोड़-मरोड़कर वर्तमान राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति की जा रही है।
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डोभाल ने ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग-2026’ में प्रतिशोध को “पावरफुल सेंटीमेंट” बताते हुए यहूदियों के कथित ऐतिहासिक प्रतिशोध की कहानी का उल्लेख किया। यह वही कथा है, जिसके सहारे इज़राइली यहूदीवाद फिलिस्तीन में नरसंहार को वैध ठहराता रहा है। इस उदाहरण का भारतीय संदर्भ में प्रयोग, अपने आप में गंभीर चेतावनी है।
इसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री का सोमनाथ मंदिर से डमरू बजाते हुए निकलना और मंदिर विध्वंस को एकांगी धार्मिक हमले के रूप में प्रस्तुत करना, संघ की वर्षों पुरानी शाखा-कथाओं को सरकारी इतिहास में बदलने की कोशिश है। तथ्य यह है कि भारतीय इतिहास में मंदिरों पर हमले मुख्यतः आर्थिक और राजनीतिक कारणों से हुए, न कि धर्म के नाम पर।
इतिहासकार कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ से लेकर आधुनिक शोध तक यह प्रमाणित है कि हिंदू राजाओं ने भी आर्थिक संकट के समय मंदिरों को लूटा, मूर्तियाँ पिघलवाईं और उनसे सिक्के बनवाए। पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चोल और परमार शासकों द्वारा मंदिरों पर हमले इतिहास में दर्ज हैं। सोमनाथ भी अपवाद नहीं था — उसे कुल 17 बार लूटा गया, हर बार महमूद गजनवी द्वारा नहीं, और अधिकतर बार लूट के बाद हमलावर लौट गए।
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सबसे अधिक धार्मिक ध्वंस यदि किसी पर हुआ, तो वह बौद्ध विहारों और जैन जिनालयों पर हुआ — और वह भी उन्हीं शासकों द्वारा, जिन्हें आज ‘सनातन संस्कृति के रक्षक’ बताया जा रहा है।
सोमनाथ के पुनर्निर्माण को लेकर भी इतिहास को झूठे ढंग से प्रस्तुत किया गया। महात्मा गांधी, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू — तीनों का स्पष्ट मत था कि सरकारी धन से किसी धार्मिक स्थल का निर्माण नहीं होना चाहिए। यही संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का आधार है, जिसे आज सुविधानुसार भुला दिया गया है।
इस पूरे वैचारिक अभियान का असली उद्देश्य साफ़ है —
देश की आर्थिक गिरावट, बेरोज़गारी, महंगाई, सामाजिक असुरक्षा और विदेश नीति की विफलताओं से ध्यान हटाना। पुलवामा, गलवान, पहलगाम और आंतरिक सुरक्षा की असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए इतिहास की कब्र खोदी जा रही है।
जब देश की जनता को एकजुट होने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, तब उसे धर्म और अतीत के नाम पर बांटने की कोशिश हो रही है। यह नफरत का वही ज़हर है, जो सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि सभ्यताओं को भी नष्ट कर देता है।
इस स्थिति में नागरिक समाज, मेहनतकश वर्ग और लोकतांत्रिक शक्तियों की जिम्मेदारी है कि वे सच को सामने लाएं, झूठ का पर्दाफाश करें और संगठित प्रतिरोध खड़ा करें।
12 फरवरी को मजदूर-किसानों की प्रस्तावित राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे प्रयासों को और व्यापक बनाने की आवश्यकता है।
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