(बुजुर्गों का योगदान)बदलते दौर में ‘सिल्वर इकोनॉमी’

भारत में बुढ़ापे को लेकर सामाजिक कलंक और बुजुर्गों पर निर्भरता की पारंपरिक धारणा, आत्मनिर्भर बुजुर्ग आबादी के विकास में बाधा डालती है। अक्सर सामाजिक मानदंड बुजुर्ग नागरिकों को सेवानिवृत्ति के बाद रोज़गार या स्वतंत्रता की तलाश करने से हतोत्साहित करते हैं। कई सरकारी कार्यक्रमों के बावजूद, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रभावी नीति कार्यान्वयन और समन्वय की कमी प्रगति में बाधा डालती है।
प्रधानमंत्री वय वंदना योजना को कार्यान्वयन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसमें 30% से भी कम पात्र वरिष्ठ नागरिक इस योजना से लाभान्वित हुए हैं।

-प्रियंका सौरभ

सिल्वर इकोनॉमी में वृद्ध आबादी, विशेष तौर पर 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए लक्षित आर्थिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं, जो उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप हैं। इसका प्राथमिक लक्ष्य वृद्धों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाना है और साथ ही उपभोक्ताओं के रूप में उनकी सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करना है। जैसे-जैसे वैश्विक आबादी बढ़ती है, यह क्षेत्र नवाचार एवं निवेश के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। भारत में, वरिष्ठ नागरिकों की आबादी वर्ष 2050 तक 319 मिलियन तक पहुँचने का अनुमान है, जो उनकी आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए सुधारों एवं नवाचारों की तत्काल आवश्यकता को दर्शाता है।

वैश्विक स्तर पर सिल्वर इकोनॉमी में आज प्रगति हो रही है। विश्व में अभूतपूर्व रूप से वृद्ध होती आबादी देखी जा रही है। वर्ष 2050 तक, दुनिया भर में 2 बिलियन से ज्यादा लोग 60 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के होंगे, जिससे आयु-विशिष्ट सेवाओं की माँग बढ़ेगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक 6 में से 1 व्यक्ति 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का होगा, जिससे स्वास्थ्य देखभाल एवं वृद्धों की देखभाल में नवाचार की आवश्यकता होगी। स्वास्थ्य देखभाल में प्रगति के कारण वैश्विक स्तर पर जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हुई है, जिससे बुजुर्गों के लिए विशेष उत्पादों एवं सेवाओं के लिए बाजार में वृद्धि हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2019 में वैश्विक जीवन प्रत्याशा बढ़कर 73.1 वर्ष हो गई है, जिससे वृद्धावस्था स्वास्थ्य देखभाल पर अधिक ध्यान केंद्रित हुआ है।

बुजुर्गों का आर्थिक योगदान देखें तो कई बुजुर्ग व्यक्ति, विशेष रूप से विकसित देशों में, निवेश, उपभोग और रोजगार के माध्यम से अर्थव्यवस्था में सक्रिय योगदानकर्ता के रूप में बने हुए हैं। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग व्यय एवं निवेश के माध्यम से अर्थव्यवस्था में प्रतिवर्ष 7.1 ट्रिलियन डॉलर का योगदान करते हैं। बुजुर्गों में दीर्घकालिक बीमारियों में वृद्धि के साथ, विशेष स्वास्थ्य सेवाओं और दवाओं की माँग बढ़ रही है।
भारत में 75% से अधिक बुजुर्ग व्यक्तियों को कम-से-कम एक दीर्घकालिक बीमारी है। टेलीमेडिसिन और वरिष्ठ नागरिकों के लिए सहायक उपकरणों जैसी प्रौद्योगिकी के एकीकरण ने सिल्वर टेक समाधानों के लिए तेजी से बढ़ता बाजार तैयार कर दिया है। भारत सरकार द्वारा शुरू की गई सेग पहल बुजुर्गों की देखभाल के लिए उत्पाद बनाने पर केंद्रित स्टार्टअप को बढ़ावा देती है, जिससे इस क्षेत्र में विकास को बढ़ावा मिलता है।

भारत के लिए सिल्वर इकोनॉमी की प्रासंगिकता आज के दिन महत्व रखती है। भारत की बुजुर्ग आबादी वर्ष 2050 तक 319 मिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है, जो कुल आबादी का लगभग 19% है, जिससे परिणामतः आयु-विशिष्ट सेवाओं की माँग बढ़ेगी। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के सरकारी डेटा से पता चलता है कि बुजुर्गों की स्वास्थ्य सेवा आवश्यकताओं में वृद्धि हुई है, जिसके लिए आयुष्मान भारत योजना जैसे नीतिगत योजनाओं की आवश्यकता प्रतीत होती है। वरिष्ठ नागरिकों में पुरानी बीमारियों में वृद्धि से विशेष रूप से जराचिकित्सा और टेलीमेडिसिन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि होगी, जिससे देखभाल की पहुँच और गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए चिकित्सा प्रौद्योगिकियों और स्वास्थ्य प्रबंधन समाधानों में नवाचारों की आवश्यकता होगी। सामाजिक न्याय मंत्रालय बुजुर्गों की देखभाल करने के लिए स्टार्टअप को प्रोत्साहित करता है, जिससे भारत की बुजुर्ग आबादी के लिए जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार होता है। सिल्वर इकोनॉमी स्वास्थ्य सेवा, आवास, यात्रा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों के माध्यम से आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करती है, जिससे रोजगार सृजन और निवेश को बढ़ावा मिलता है। भारत की सिल्वर इकोनॉमी का वर्तमान मूल्य लगभग 73,082 करोड़ रुपये होने का अनुमान है और आने वाले वर्षों में इसके कई गुना बढ़ने की उम्मीद है जो उनके अनुभवों और कौशल को महत्त्वप्रदान करता है।

सिल्वर अर्थव्यवस्था के विस्तार के लिए सहायक नीतियों और ढाँचों के निर्माण की आवश्यकता है, जो वृद्धों के लिए सेवाओं में समावेशिता, पहुँच एवं स्थिरता को बढ़ावा दें। भारत में सिल्वर इकॉनोमी संबंधी ढाँचा विकसित करने की चुनौतियाँ भी कम नहीं है। भारत में स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना में वृद्ध आबादी के लिए अक्सर पर्याप्त संसाधनों और पहुँच का अभाव होता है, जिसके कारण गुणवत्तापूर्ण देखभाल में अंतराल होता है और निवारक एवं वृद्धावस्था सेवाओं पर सीमित ध्यान दिया जाता है, जो दीर्घकालिक बीमारियों के प्रभावी प्रबंधन में बाधा डालता है। भारत में कई बुजुर्गों को पेंशन तक सीमित पहुँच एवं बढ़ती चिकित्सा लागत का सामना करना पड़ता है, जिससे वे असुरक्षित हो जाते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 70% बुजुर्ग आबादी रोजमर्रा के भरण-पोषण के लिए आश्रित है, और 78% बिना किसी पेंशन कवर के रह रहे हैं। भारत के बुजुर्गों में डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण ई-गवर्नेंस सेवाओं और डिजिटल स्वास्थ्य देखभाल समाधानों तक उनकी पहुँच सीमित हो जाती है, जिससे असमानताएँ बढ़ जाती हैं।

भारत में बुढ़ापे को लेकर सामाजिक कलंक और बुजुर्गों पर निर्भरता की पारंपरिक धारणा, आत्मनिर्भर बुजुर्ग आबादी के विकास में बाधा डालती है। अक्सर सामाजिक मानदंड बुजुर्ग नागरिकों को सेवानिवृत्ति के बाद रोज़गार या स्वतंत्रता की तलाश करने से हतोत्साहित करते हैं। कई सरकारी कार्यक्रमों के बावजूद, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रभावी नीति कार्यान्वयन और समन्वय की कमी प्रगति में बाधा डालती है।
प्रधानमंत्री वय वंदना योजना को कार्यान्वयन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसमें 30% से भी कम पात्र वरिष्ठ नागरिक इस योजना से लाभान्वित हुए हैं।

भारत में सिल्वर इकॉनोमी के लिए आगे की राह को मजबूत करना समय की मांग है। सरकार को बढ़ती बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए टेलीमेडिसिन एवं बुजुर्गों की देखभाल के प्रशिक्षण सहित जराचिकित्सा देखभाल के बुनियादी ढाँचे को बढ़ाना चाहिए। बुजुर्गों के लिए विशेष देखभाल को शामिल करने के लिए आयुष्मान भारत के दायरे का विस्तार करने से स्वास्थ्य परिणामों में काफी सुधार हो सकता है। व्यापक पेंशन सुधारों को लागू करना महत्त्वपूर्ण है जो बुजुर्गों के सभी वर्गों को कवर करते हैं और पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा प्रदान करते हैं।

अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को शामिल करने के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना की पहुँच को व्यापक बनाना वरिष्ठ नागरिकों के बीच वित्तीय स्वतंत्रता को बढ़ा सकता है। यह सुनिश्चित करना कि बुजुर्ग व्यक्तियों के पास डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों तक पहुँच हो, उन्हें सरकारी योजनाओं से लाभान्वित होने एवं डिजिटल अर्थव्यवस्था में भाग लेने में मदद करेगा। सरकार के डिजिटल साक्षरता अभियान में डिजिटल डिवाइड को भरने के लिए बुजुर्गों के लिए विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल शामिल किए जा सकते हैं। वरिष्ठ नागरिकों को उद्यमशीलता गतिविधियों में शामिल होने और उनके अनुभव एवं कौशल का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित करने से नए व्यावसायिक अवसर उत्पन्न हो सकते हैं। सेज (SAGE) कार्यक्रम बुजुर्गों के नेतृत्व वाले स्टार्टअप को बुजुर्गों की देखभाल सेवाओं एवं उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। बुजुर्गों की देखभाल के लिए अभिनव उत्पाद एवं सेवाएँ विकसित करने के लिए सहयोग आवश्यक है, जिससे सिल्वर इकोनॉमी को और अधिक गतिशील बनाया जा सके।

पोर्टल का विस्तार करके निजी कंपनियों के साथ भागीदारी को शामिल किया जा सकता है, जिससे वरिष्ठ नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। सिल्वर इकॉनमी एक बढ़ती हुई वैश्विक और राष्ट्रीय घटना है, जिसमें भारत की जनसांख्यिकीय चुनौती को आर्थिक अवसर में बदलने की महत्त्वपूर्ण क्षमता है। स्वास्थ्य सेवा, वित्तीय सुरक्षा और डिजिटल समावेशन की चुनौतियों का समाधान करके, भारत एक सतत और मजबूत अर्थव्यवस्था बन सकता है जो अपनी बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को पूरा कर सकती है, समाज में उनके कल्याण एवं समावेश सुनिश्चित करती है।

Editor CP pandey

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