“बिहार की राजनीति: जहां सत्ता नहीं, गठबंधन ही असली मुख्यमंत्री है”

गठबंधनों के गणित में उलझा जनादेश, विचारधारा से अधिक समीकरणों का दौर)

राष्ट्र की परम्परा डेस्क ✍️ बिहार की राजनीति किसी रंगमंच से कम नहीं—यहां हर किरदार की अपनी स्क्रिप्ट है, लेकिन मंच साझा है। कोई भी अभिनेता अकेले तालियां नहीं बटोर सकता। यहां विचारधाराएं नहीं, समीकरण तय करते हैं कि कौन ‘कुर्सी’ पर बैठेगा। 35 साल से बिहार की सत्ता एक ही कहानी दोहराती रही है—गठबंधन बने, टूटे, फिर बने। जनता हर बार ‘परिवर्तन’ का सपना लेकर वोट डालती है, लेकिन नतीजा हमेशा “साझा सरकार” का ही होता है। सवाल उठता है—क्या बिहार की राजनीति गठबंधन की लत में इस कदर डूब चुकी है कि अब यहां बहुमत नाम की चीज़ बची ही नहीं?
🧭 बिहार की सियासत का सफरनामा: 1990 से 2025 तक
अगर बिहार की राजनीति का इतिहास खोला जाए, तो 1990 से अब तक यह कहानी दो चेहरों के इर्द-गिर्द घूमती है—लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार।
लालू यादव ने 1990 में भाजपा के समर्थन से सत्ता की सीढ़ी चढ़ी, और फिर उसी भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाकर नया समीकरण गढ़ा।
दूसरी ओर, नीतीश कुमार राजनीति के सबसे “लचीले” रणनीतिकार साबित हुए—कभी एनडीए में, कभी महागठबंधन में, और फिर दोबारा एनडीए में।
35 वर्षों में नीतीश कुमार 9 बार मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके हैं—लेकिन हर बार किसी न किसी गठबंधन के सहारे। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए विचारधारा से ज्यादा ज़रूरी “साझेदारी” बन गई है।
⚖️ गठबंधन की राजनीति बनाम विचारों की राजनीति
कभी राजनीति का आधार विचारधारा होती थी—विकास, सामाजिक न्याय या राष्ट्रीय एकता। पर बिहार में समीकरणों ने विचारों को पीछे छोड़ दिया है।
यहां कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता जातीय जोड़-घटाव से तय होता है। यादव, कुर्मी, भूमिहार, मुसलमान—हर जाति का अपना “राजनीतिक ठिकाना” है।
आरजेडी का ‘MY समीकरण’ (मुस्लिम-यादव) तभी कारगर होता है जब कांग्रेस या वामदल जैसे सहयोगी उसके साथ हों।
वहीं भाजपा को सवर्ण वोट से लेकर अतिपिछड़ा समाज तक पहुंचने के लिए नीतीश कुमार या जीतनराम मांझी जैसे सहयोगियों की जरूरत होती है।
बिहार में राजनीति की यह “केमिस्ट्री” इतनी जटिल हो चुकी है कि वोट बैंक ही गठबंधन की असली प्रयोगशाला बन गया है।
🧩 वोट का विज्ञान और गठबंधन की केमिस्ट्री
बिहार के चुनावी आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि किसी भी दल को अकेले 35% से अधिक वोट नहीं मिले।
इसका मतलब साफ है—“अकेले चलना नुकसान का सौदा” है।
यही कारण है कि चुनाव से पहले ही पार्टियां “पोस्ट-इलेक्शन अरेंजमेंट” पर काम करने लगती हैं।
आज महागठबंधन में 7 दल हैं और एनडीए में 5 सहयोगी।
लेकिन अंदरखाने हर चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर रस्साकशी जारी रहती है।
इतना ही नहीं, जैसे ही सत्ता समीकरण बदलते हैं, गठबंधन भी बदल जाता है—यानी यहां दोस्ती भी मौसमी है और दुश्मनी भी रणनीतिक।
अस्थिर सरकारों का इतिहास: सत्ता का खेल, जनता का भ्रम
1967 से लेकर अब तक बिहार में 9 बार ऐसी स्थिति बनी जब सरकारें कुछ ही महीनों में गिर गईं।
कभी मुख्यमंत्री का कार्यकाल सिर्फ 7 दिन भी रहा।
ऐसे में राजनीति के खिलाड़ी समझ गए कि जनता चाहे जिसे चुने, कुर्सी उन्हीं की होगी जो जोड़-घटाव के माहिर हैं।
इससे जनता का भरोसा धीरे-धीरे “व्यक्ति” से हटकर “गठबंधन” पर चला गया।
लेकिन विडंबना यह है कि गठबंधन आने के बाद जिम्मेदारी किसी की तय नहीं रहती—विकास ठहर जाता है, जवाबदेही बंट जाती है।
🧮 जाति और सत्ता का गणित
बिहार में राजनीति जाति से शुरू होती है और उसी पर खत्म भी।
हर जाति अपने नेता को “अपना प्रतिनिधि” मानती है, और यही नेताओं की ताकत बनती है।
इसलिए हर चुनाव में पार्टियां नारे नहीं, समीकरण लेकर उतरती हैं—
आरजेडी: मुसलमान + यादव
जेडीयू: कुर्मी + अतिपिछड़ा
भाजपा: सवर्ण + अति पिछड़ा + दलित
कांग्रेस और वामदल: अल्पसंख्यक + शहरी बुद्धिजीवी वोट
यह जातीय संतुलन ही तय करता है कि गठबंधन किस ओर झुकेगा।
सत्ता का सूत्र बस इतना है—जिसके पास जोड़ने की कला है, वही आगे बढ़ेगा।
🧭 गठबंधन की लत या लोकतंत्र की मजबूरी?
यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार में गठबंधन अब एक राजनीतिक नशा बन चुका है।
नेता जानते हैं कि जनता उन्हें विचारधारा पर नहीं, गठबंधन की छतरी पर चुनती है।
यह स्थिति लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंताजनक है—क्योंकि जब सत्ता साझी होती है, तो जवाबदेही बंट जाती है।
कोई भी नेता अकेले निर्णय नहीं लेता, सब “कंसेंसस” के नाम पर जिम्मेदारी टाल देते हैं।
इससे विकास की रफ्तार धीमी और नीतियों की दिशा अस्थिर रहती है।
🔍 आगे का रास्ता: क्या बिहार कभी गठबंधन मुक्त होगा?
बिहार की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां जनता खुद यह तय करेगी कि क्या उसे हर बार “साझा सरकार” चाहिए या स्थिर नेतृत्व।
नई पीढ़ी के मतदाता जातीय सोच से आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें रोजगार, शिक्षा और विकास चाहिए।
अगर यह प्रवृत्ति बढ़ी, तो शायद पहली बार बिहार में कोई दल बहुमत हासिल कर पाए।
पर अभी के हालात में यह कहना जल्दबाजी होगी।
क्योंकि बिहार की सियासत का असली नियम यही है—“बिना जोड़ के कोई जोड़ नहीं।”
🕊️ समापन: सत्ता का खेल या जनादेश का अपमान बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा सबक यही है कि सत्ता किसी एक के पास नहीं रहती।
यह लगातार घूमती रहती है—जैसे कोई मशाल जो हर बार नए हाथ में चली जाती है।
पर सवाल वही रहता है—क्या जनता के हाथ में कभी यह मशाल लौटेगी?
जब तक गठबंधन की गणित में जनता की ज़रूरतें नहीं जुड़तीं, तब तक बिहार का लोकतंत्र अधूरा ही रहेगा।

ये भी पढ़ें –दीपों की रोशनी में निहित है मानवता, सौहार्द और नई शुरुआत का संदेश

ये भी पढ़ें –अमेरिका की चेतावनी: हमास गाजा में फलस्तीनियों पर हमले की तैयारी में, संघर्षविराम समझौते का उल्लंघन बताया

ये भी पढ़ें –छोटी दिवाली 2025: क्या आज खुले रहेंगे बैंक? जानें RBI गाइडलाइन और हॉलिडे लिस्ट का पूरा अपडेट

ये भी पढ़ें –जर्मनी का झांसा देकर रूस भेजा गया युवक, युद्ध में बम विस्फोट में मौत, शव डेढ़ माह बाद पहुंचा कैथल

Editor CP pandey

Recent Posts

सड़क हादसे में कांग्रेस पार्टी के नगर अध्यक्ष जीतेन्द्र जायसवाल क़ी दर्दनाक मौत

बरहज/देवरिया(राष्ट्र क़ी परम्परा)।थाना क्षेत्र के कान्हा गौशाला के पास रामजानकी मार्ग पर बाइक सवार कांग्रेस…

9 hours ago

सेवा, अनुशासन और समर्पण के संदेश के साथ एनएसएस का विशेष शिविर संपन्न

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दिग्विजय नाथ पी.जी. कॉलेज गोरखपुर में संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना के…

10 hours ago

भक्ति और श्रद्धा से सराबोर हुई सरयू की धरा

इशारू ग्राम की भव्य कलश यात्रा ने जगाया आध्यात्मिक उत्साह भागलपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)l इशारू…

11 hours ago

गैंगेस्टर एक्ट का आरोपी बंटी राजभर गिरफ्तार, बरहज पुलिस की बड़ी कार्रवाई

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद में अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत…

12 hours ago

अंतर्राष्ट्रीय वानिकी दिवस पर वृक्षारोपण अभियान, ग्रामीणों को किया गया जागरूक

मऊ, (राष्ट्र की परम्परा)अंतर्राष्ट्रीय वानिकी दिवस के अवसर पर सामाजिक वानिकी वन प्रभाग, मऊ द्वारा…

12 hours ago

ओवरलोड वाहनों पर पुलिस का शिकंजा: 24 घंटे में 14 वाहन सीज, अभियान से मचा हड़कंप

नियम तोड़ने वालों पर सख्ती जारी-ओवरलोडिंग पर पुलिस का जीरो टॉलरेंस महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।…

12 hours ago