2026 का संकल्प: व्यक्तिगत सफलता नहीं, सामूहिक राष्ट्रीय उत्थान का वर्ष

नववर्ष 2026-व्यक्तिगत आकांक्षाओं से राष्ट्रीय संकल्प तक-वैश्विक जिम्मेदारी की ओर बढ़ता भारत- करना है ऐसा धमाल- दुनियाँ कहे वाह रे भारत माता के लाल!

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत सहित हर देश में नया वर्ष जब दस्तक देता है, तो वह केवल दीवार पर टंगे कैलेंडर का एक पन्ना नहीं बदलता, बल्कि वह मनुष्य के भीतर सोई हुई उम्मीदों को जगाता है, बीते अनुभवों से उपजी आशंकाओं को सामने लाता है और भविष्य के लिए नए संकल्पों की ज़मीन तैयार करता है। हर व्यक्ति यही कामना करता है कि आने वाला वर्ष उसके जीवन में सुख, सफलता और स्थिरता लेकर आए, किंतु समय की मांग यही है कि 2026 में हम केवल अपने व्यक्तिगत भविष्य तक सीमित न रहें, बल्कि राष्ट्र और मानवता के भविष्य के बारे में भी गहराई से सोचें। यह वर्ष केवल एक और वर्ष नहीं, बल्कि भारत के लिए विज़न 2047 की ओर तेज़ी से बढ़ने का एक निर्णायक पड़ाव है,जहाँ हमारी सोच,हमारी प्राथमिकताएँ और हमारे कर्म,आने वाले दशकों की दिशा तय करेंगे। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि वर्ष 2026 ऐसे समय में प्रवेश कर रहा है,जब विश्व अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।भू-राजनीतिक अस्थिरता,जलवायु संकट, तकनीकी क्रांति,आर्थिक पुनर्संरचना और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा,ये सभी वैश्विक वास्तविकताएँ भारत के सामने भी हैं। ऐसे में नया वर्ष केवल शुभकामनाओं और उत्सवों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उसे कर्म-प्रधान, संकल्प- आधारित और राष्ट्र-केंद्रित सोच के साथ अपनाना होगा। यह समय है जब व्यक्तिगत सपनों और राष्ट्रीय उद्देश्यों के बीच सेतु बनाया जाए।

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साथियों बात अगर हम नव वर्ष 2026 के आगमन की करें तो हर किसी की यह स्वाभाविक कामना होती है कि नया साल उसके लिए बेहतर अवसर लेकर आए,अच्छी शिक्षा,बेहतररोजगार आर्थिक सुरक्षा,स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन। लेकिन 2026 हमें यह भी याद दिलाता है कि एक सशक्त राष्ट्र के बिना व्यक्तिगत प्रगति भी अधूरी है। जब भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मज़बूत होता है,जब उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर और समावेशी होती है, जब उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएँ विश्व के लिए उदाहरण बनती हैं, तब उसका लाभ प्रत्येक नागरिक तक पहुँचता है। इसलिए इस बार नया साल केवल मेरे लिए क्या बेहतर होगा का प्रश्न नहीं, बल्कि मैं अपने राष्ट्र के लिए क्या बेहतर कर सकता हूँ का भी अवसर है।भारत आज विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था, उभरती हुई आर्थिक शक्ति और युवा आबादी वाला देश है। 2026 में दुनियाँ की निगाहें भारत पर और अधिक टिकेंगी,चाहे वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उसकी भूमिका हो,जलवायु नेतृत्व हो, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर हो या फिर शांति और कूटनीति में उसकी भागीदारी।ऐसे में हर नागरिक का आचरण,हर नीति का प्रभाव और हर निर्णय का संदेश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पढ़ा जाएगा। नया वर्ष हमें यह समझने का अवसर देता है कि राष्ट्र की छवि केवल सरकारों से नहीं, बल्कि नागरिकों के व्यवहार से भी बनती है।

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साथियों बात अगर हम जब नया वर्ष आता है,तो वह मनुष्य को आत्ममंथन का अवसर देता है,इसको समझने की करें तो यह वह क्षण होता है, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं,हमने बीते वर्ष अपने लिए क्या किया, अपने परिवार के लिए क्या किया, अपने समाज के लिए क्या किया और इस धरती के लिए क्या किया। क्या हमने प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाया, या केवल संसाधनों का उपभोग किया? क्या हमने मानवता के मूल्यों,करुणा,सहिष्णुता और न्याय,को मजबूत किया, या केवल अपने हितों तक सीमित रहे? 2026 की दहलीज पर खड़े होकर ये प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।वर्ष 2026 कर्म- प्रधान होने वाला है। यह वह दौर है,जब केवल योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं होगा,बल्कि उन्हें ज़मीन पर उतारने की परीक्षा होगी। भारत के लिए यह समय है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यावरण और तकनीक के क्षेत्रों में ठोस परिणाम दिखाए। अंतरराष्ट्रीय समुदाय आज केवल घोषणाओं पर नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की गुणवत्ता पर ध्यान देता है। नया वर्ष हमें यह संदेश देता है कि यदि हम वैश्विक मंच पर बुलंदियों को छूना चाहते हैं, तो हमें अपनी आंतरिक संरचनाओं को भी उतना ही मज़बूत बनाना होगा।

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साथियों बात अगर हम नई संभावनाओं के साथ नई चुनौतियाँ भी आती हैं इसको समझने की करें तो, 2026 में भारत को जिस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है,उनमें आर्थिक असमानता,जलवायुपरिवर्तन के प्रभाव,तकनीकी बेरोज़गारी, सामाजिक ध्रुवीकरण और वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव प्रमुख हैं।इन चुनौतियों से निपटने के लिए केवल सरकारों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। नागरिकों को भी सजग, जागरूक और जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी। नया वर्ष हमें यह अवसर देता है कि हम मुकाबला करने का दृढ़ संकल्प लें,चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर हो या राष्ट्रीय स्तर पर।विज़न 2047 केवल एक सरकारी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक सामूहिक राष्ट्रीय स्वप्न है,एक ऐसा भारत, जो आर्थिक रूप से समृद्ध,सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण,पर्यावरणीय रूप से संतुलित और वैश्विक रूप से सम्मानित हो। 2026 इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यदि हम इस वर्ष अपने लक्ष्यों, प्राथमिकताओं और संसाधनों को सही दिशा में नहीं मोड़ते, तो 2047 का सपना केवल कागज़ों तक सीमित रह सकता है।इसलिए नया वर्ष हमें यह चेतावनी भी देता है और यह अवसर भी।

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साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तरपर देखें तो 2026 में विश्व व्यवस्था तेज़ी से बहुध्रुवीय हो रही है। पारंपरिक महाशक्तियों के साथ-साथ नए क्षेत्रीय और उभरते देश वैश्विक निर्णयों में भूमिका निभा रहे हैं। भारत के पास यह ऐतिहासिक अवसर है कि वह केवल एक अनुसरणकर्ता न रहे, बल्कि नीति-निर्माता के रूप में उभरे। इसके लिए आवश्यक है कि भारत की आंतरिक नीतियाँ, शिक्षा से लेकर नवाचार तक, वैश्विक मानकों के अनुरूप हों। नया वर्ष हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम किस तरह का भारत दुनियाँ के सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं।नया साल आत्मनिरीक्षण का भी समय होता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमने विकास की दौड़ में कई बार पर्यावरण, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों की उपेक्षा की है। 2026 हमें यह याद दिलाता है कि विकास केवल जीडीपी के आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता,बल्कि मानव विकास, खुशहाली और प्रकृति के साथ संतुलन से मापा जाता है। यदि हम धरती के साथ अन्याय करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी। इसलिए नए वर्ष में यह संकल्प आवश्यक है कि विकास और संरक्षण साथ-साथ चलें।

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साथियों बात अगर हम मानवता के स्तर पर भी 2026 एक परीक्षा का वर्ष हो सकता है इसको समझने की करें तो, युद्ध, विस्थापन, शरणार्थी संकट और मानवीय आपदाएँ दुनिया को लगातार चुनौती दे रही हैं। भारत की सभ्यतागत परंपरा वसुधैव कुटुम्बकम् की रही है। नया वर्ष हमें यह अवसर देता है कि हम इस विचार को केवल भाषणों तक सीमित न रखें, बल्कि वैश्विक सहयोग, शांति प्रयासों और मानवीय सहायता में ठोस भूमिका निभाएँ। यही वह रास्ता है, जिससे भारत न केवल शक्तिशाली, बल्कि विश्वसनीय भी बनेगा। व्यक्तिगत स्तर पर 2026 हमें यह सिखाता है कि आत्मकेंद्रित सफलता अब पर्याप्त नहीं है। एक जागरूक नागरिक वही है,जो अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे। मतदान से लेकर कर भुगतान तक, सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण से लेकर सामाजिक सद्भाव तक, ये सभी छोटे-छोटे कर्म मिलकर राष्ट्र के बड़े भविष्य का निर्माण करते हैं। नया वर्ष हमें यह अवसर देता है कि हम अपने आचरण को राष्ट्र निर्माण से जोड़ें।जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो हमें यह भी सोचना होगा कि हमने समाज के सबसे कमजोर वर्गों के लिए क्या किया। क्या हमारी प्रगति समावेशी रही, या कुछ वर्ग पीछे छूटते गए? 2026 में भारत के सामने यह नैतिक चुनौती है कि विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की साख तभी मज़बूत होगी, जब वह अपने भीतर सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करेगा।नया वर्ष हमें नए लक्ष्य तय करने का मौका देता है,ऐसे लक्ष्य, जो केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न हों, बल्कि नैतिक और मानवीय मूल्यों से भी जुड़े हों। 2026 में यह आवश्यक है कि हम अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाएं, संकीर्ण हितों से ऊपर उठें और दीर्घकालिक सोच अपनाएँ। यही वह दृष्टि है, जो भारत को 2047 तक एक विकसित और विश्व-नेतृत्वकारी राष्ट्र बना सकती है।

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अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नया वर्ष 2026एक प्रश्न भी है और एक निमंत्रण भी। प्रश्न यह कि क्या हम केवल बेहतर भविष्य की कामना करेंगे,या उसके लिए आवश्यक कर्म भी करेंगे? निमंत्रण यह कि हम व्यक्तिगत आकांक्षाओं से आगे बढ़कर राष्ट्रीय संकल्प और वैश्विक जिम्मेदारी को अपनाएँ। यदि हम इस वर्ष अपने संकल्पों को ईमानदारी से कर्म में बदल पाए,तो न केवल हमाराव्यक्तिगत जीवन बेहतर होगा, बल्कि भारत भीअंतरराष्ट्रीय मंच पर नई ऊँचाइयों को छुएगा।नववर्ष 2026 हमें यही सिखाता है कि समय बदलने से पहले हमें स्वयं को बदलना होगा।जब नागरिक जागरूक होंगे,समाज संवेदनशील होगा और राष्ट्र संकल्पबद्ध होगा, तभी विज़न 2047 का सपना साकार हो पाएगा। यही नए वर्ष का सार है, यही उसका सत्य और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी।

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-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

Editor CP pandey

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