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“स्वदेशी जूते, वैश्विक पहचान: घरेलू उत्पादकों को चाहिए सरकारी सहारा”

“स्वदेशी कदमों की गूंज: जूता उद्योग को चाहिए सरकार-उद्यमियों की साझा चाल”

आगरा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)भारत का फुटवियर उद्योग अब एक नए मोड़ पर खड़ा है, जहाँ स्थानीय उत्पादन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी हो गया है। “एफमेक” के सचिव अनिरुद्ध तिवारी ने चिंता जताई कि भारत में जूते-चप्पलों पर प्रति व्यक्ति वार्षिक खर्च मात्र ₹1,500 है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कई गुना अधिक है। उनका मानना है कि यदि सरकार तीन डॉलर आयात मूल्य से कम के फुटवियर पर 35% कस्टम ड्यूटी लागू करे और घरेलू उत्पादकों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी सुरक्षा दे, तो स्थानीय उद्योग को नई ऊर्जा मिल सकती है।

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उन्होंने कहा कि “यह समय है जब सरकार और उद्यमियों के सामूहिक प्रयास से देशी ब्रांडों को विश्व बाजार में पहचान दिलाई जा सकती है। अगर हम अपने संसाधनों और तकनीक का सही उपयोग करें तो भारत ‘मेड इन इंडिया फुटवियर’ के जरिए रोजगार और निर्यात दोनों में अग्रणी बन सकता है।”

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इस अवसर पर ललित अरोरा, दीपक मनचंदा (इफ्कोमा), विजय सामा (शू फैक्टर्स फेडरेशन), विजय निझावन, रेनुका डंग, नकुल मनचंदा, अर्पित ग्रोवर, दिलीप रैना सहित उद्योग जगत की कई प्रमुख हस्तियां उपस्थित रहीं।

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सभी ने एक स्वर में कहा कि स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना न केवल अर्थव्यवस्था को सशक्त करेगा, बल्कि रोजगार सृजन के नए अवसर भी खोलेगा।

Editor CP pandey

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