नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को लेकर देश में राजनीतिक बहस लगातार जारी है। विपक्ष जहां कई मौकों पर मोदी सरकार पर अमेरिका के दबाव में काम करने का आरोप लगाता रहा है, वहीं भारत-अमेरिका संबंधों से जुड़े कुछ हालिया घटनाक्रमों ने नई चर्चा छेड़ दी है। रूस से तेल खरीदने पर टैरिफ का दबाव, एच-1बी वीजा को लेकर विवाद और भारतीय बाजार में स्टारलिंक की संभावित एंट्री जैसे मुद्दों पर अमेरिकी नेताओं और कारोबारी जगत की प्रतिक्रियाएं सवाल उठा रही हैं कि क्या वॉशिंगटन भारत के साथ अपने रुख में व्यावहारिक बदलाव कर रहा है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और उद्योगपति एलन मस्क से जुड़े बयानों को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, इन घटनाओं को सीधे अमेरिका के भारत के सामने झुकने का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। इनके पीछे कूटनीतिक हितों, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा बाजार और अमेरिकी घरेलू राजनीति की भी अहम भूमिका है।
भारत और अमेरिका के बीच रूस से तेल खरीदने का मुद्दा लंबे समय से व्यापारिक तनाव की वजह बना हुआ है। अमेरिकी प्रशासन ने रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी दी थी। लेकिन भारत का पक्ष स्पष्ट रहा है कि देश की ऊर्जा जरूरतों, कीमतों और आपूर्ति की स्थिरता को ध्यान में रखकर ही फैसले किए जाएंगे। भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है और रूस से तेल खरीद में अचानक बड़ा बदलाव करना उसकी अर्थव्यवस्था के लिए आसान नहीं है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की ओर से भारत की ऊर्जा जरूरतों और रूस से तेल आयात में बदलाव की व्यावहारिक कठिनाइयों को स्वीकार किए जाने की खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। यदि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत आगे बढ़ती है, तो ऊर्जा विवाद के समाधान में भी इसकी भूमिका हो सकती है। हालांकि, टैरिफ संबंधी किसी भी फैसले के वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए आधिकारिक आदेशों और समझौते की शर्तों को देखना जरूरी होगा।
भारत के लिए यह केवल रूस से तेल खरीदने का सवाल नहीं है। पेट्रोलियम की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर परिवहन, उद्योग, खेती और आम उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। ऊर्जा आपूर्ति महंगी होने से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए सस्ती और भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करना राष्ट्रीय आर्थिक हितों से जुड़ा विषय है।
दूसरी ओर, अमेरिका भी वैश्विक ऊर्जा बाजार से अलग नहीं है। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी अमेरिकी उपभोक्ताओं को प्रभावित कर सकती है और महंगाई राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन सकती है। आगामी मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर ट्रंप प्रशासन के सामने घरेलू आर्थिक चुनौतियां भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे हालात में भारत जैसे बड़े बाजार और प्रमुख रणनीतिक साझेदार के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखना अमेरिका के हित में भी है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और अहम पहलू एच-1बी वीजा विवाद है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की विदेशी कर्मचारियों को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद खड़ा हुआ था। उनके शब्दों को भारतीय पेशेवरों के अपमान के तौर पर देखा गया और भारत की ओर से भी आपत्ति जताई गई। बाद में वेंस ने स्पष्ट किया कि उनकी आलोचना विदेशी कर्मचारियों से ज्यादा उस व्यवस्था और कंपनियों को लेकर थी, जिसमें वीजा पर निर्भर कर्मचारी अपने रोजगार और अधिकारों को लेकर असुरक्षित महसूस कर सकते हैं।
वेंस ने यह भी संकेत दिया कि उनकी भाषा बेहतर हो सकती थी। उन्होंने अपनी पत्नी उषा वेंस और उनके भारतीय मूल के परिवार के प्रति सम्मान का उल्लेख भी किया। हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बावजूद एच-1बी वीजा को लेकर अमेरिका में जारी बहस समाप्त नहीं हुई है। भारतीय आईटी पेशेवरों और कंपनियों के लिए वीजा नियमों में बदलाव आज भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
इसी बीच, एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक और भारतीय कारोबारी मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़ा मामला भी चर्चा में रहा है। भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार की संभावनाओं के बीच बाजार में प्रतिस्पर्धा, लाइसेंस और नियामकीय शर्तों को लेकर बहस सामने आई। रिलायंस की ओर से यह रुख रखा गया कि प्रतिस्पर्धा का स्वागत है, लेकिन सभी कंपनियों को भारतीय कानूनों और नीतियों का पालन करना होगा।
रिलायंस की प्रतिक्रिया के बाद मस्क की ओर से ‘Much appreciated’ कहे जाने को भी चर्चा मिली। लेकिन इस प्रतिक्रिया को किसी बड़े नीतिगत विवाद के समाप्त होने या भारत के दबाव में झुकने का निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता। सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं में प्रवेश के लिए लाइसेंस, स्पेक्ट्रम, सुरक्षा और अन्य नियामकीय शर्तें अहम रहेंगी। अंतिम तस्वीर संबंधित सरकारी मंजूरियों और नीतिगत फैसलों से ही स्पष्ट होगी।
इन तीनों मुद्दों को एक साथ देखें तो भारत की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक अहमियत सामने आती है। ऊर्जा बाजार में भारत की बड़ी भूमिका है, भारतीय पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं और देश का विशाल डिजिटल बाजार वैश्विक कंपनियों के लिए आकर्षक है। यही कारण है कि अमेरिका के साथ किसी भी बड़े विवाद में दोनों पक्षों को अपने हितों और संभावित नुकसान का आकलन करना पड़ता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति के समर्थक इन घटनाक्रमों को भारत की मजबूत कूटनीति और स्वतंत्र निर्णय क्षमता के उदाहरण के रूप में देखते हैं। वहीं, आलोचकों का कहना है कि किसी बयान में नरमी या व्यापार वार्ता में प्रगति को सीधे कूटनीतिक जीत घोषित करने से पहले ठोस नतीजों का आकलन होना चाहिए। किसी भी देश की विदेश नीति का मूल्यांकन केवल बयानों से नहीं, बल्कि समझौतों, व्यापारिक शर्तों, निवेश, ऊर्जा लागत और राष्ट्रीय हितों पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव से किया जाता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि भारत-अमेरिका संबंधों में जारी बातचीत का ठोस परिणाम क्या निकलता है। क्या रूस से तेल खरीद को लेकर भारत को राहत मिलेगी? क्या व्यापार समझौते की शर्तें भारतीय उद्योग और निर्यातकों के अनुकूल होंगी? क्या एच-1बी वीजा के नियम भारतीय पेशेवरों के लिए अधिक व्यावहारिक बनेंगे? और क्या स्टारलिंक सहित सभी कंपनियों को भारत के नियामकीय ढांचे के तहत समान अवसर मिलेंगे?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय करने में अहम होंगे। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भागीदार है और उसके फैसलों का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तथा रणनीतिक समीकरणों पर पड़ता है। अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते भारत के लिए जरूरी हैं, लेकिन उतना ही जरूरी है कि व्यापार, ऊर्जा और तकनीक से जुड़े फैसले देश के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर किए जाएं। असली कूटनीतिक सफलता इसी में होगी कि बातचीत से भारत को ठोस लाभ मिले और दोनों देशों के रिश्ते दबाव के बजाय आपसी सम्मान और व्यावहारिक सहयोग के आधार पर आगे बढ़ें।
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